ओबीसी आरक्षण समाप्ति कि ओर...

वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा जारी कि गई किसी भी भर्ती में उतने पद नहीं होते हैं, जितना ओबीसी का आरक्षण है, यानी 27 प्रतिशत। पिछले कुछ वर्षो की किसी भी भर्ती को उठाकर देख लीजिए 27% ओबीसी के पद आपको किसी भी भी भर्ती में देखने को नहीं मिलेंगे, हाल ही हुई प्रत्येक भर्ती में ओबीसी के पद 15 प्रतिशत के आसपास ही आते हैं। ऐसे में कई सवाल उठते हैं आखिर ओबीसी को अपने आरक्षण का पूरा हक क्यों नहीं मिल रहा है? 


एक तरफ विभिन्न सामाजिक संघठन आरक्षण को मजबूत करने के लिए आवाज उठाते हैं, दूसरी तरफ कई राजनैतिक दल भी ओबीसी के नाम पर राजनीति करते हुए तो देखने को मिलते हैं। लेकिन जहां आवाज उठानी है, जो मुद्दा दुनिया के सामने रखना है, वहाँ सब चुप्पी साध लेते हैं। आज जो कुछ भी ओबीसी समाज के साथ हो रहा है वो किसी से छुपा हुआ नहीं है। लेकिन कोई उस जायज मुद्दे पर बात करने को तैयार नहीं है, आखिर ओबीसी को अपना हक क्यों नहीं मिल रहा हैं? आज कोई भी संगठन ओबीसी समाज को यह नहीं बता रहा है कि आपका आरक्षण नौकरियो के लिए समाप्त हो चुका है, अब वो सिर्फ़ दिखाने के लिए काग़ज़ों में ही बचा हुआ है। 

ओबीसी वर्ग को किसी भी सरकारी नौकरी मे कितने पद मिलने चाहिए आरक्षण और रोस्टर पंजिका के के अनुसार -


आरक्षण और रोस्टर पंजिका को ध्यान में रखते हुए बात करे तो 27% पद सरकारी नौकरी के साथ विभिन्न विश्विद्यालय में छात्रों को प्रवेश देने के लिए केंद्र में सुरक्षित किए गए हैं, ओबीसी वर्ग के लिए। वहीं विभिन्न प्रदेशों में अलग-अगल प्रतिशत निश्चित किया हुआ है। जैसे राजस्थान में 21% पद ओबीसी के लिए आरक्षित है।

केंद्र की नौकरियां में ओबीसी वर्ग का आरक्षण 27% है, जिसका अर्थ यह होता है कि केंद्र द्वारा जारी की जाने वाली सरकारी नौकरी की विज्ञप्तियों में कुल पदो के 27% पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित होने चाहिए। उदाहरणार्थ अगर भारतीय डाक सेवा में किसी संवर्ग विशेष के लिए 1000 पद विज्ञापित किए गए है तो उसमे से 27% ओबीसी के लिए आरक्षित होंगे अर्थात्‌ 1000 कुल पदों में से 270 पद आरक्षित होने चाहिए ओबीसी वर्ग के लिए। 

क्या हाल है वर्तमान में आरक्षण का - 


पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई भर्तियां के वर्ग वार आरक्षित किए गए पदों का अध्ययन किया जाए तो इस बात का खुलासा होता है कि अधिकांश भर्तियों में ओबीसी वर्ग को आरक्षण के अनुसार अपना हक नहीं मिला है। केंद्र द्वारा जारी की गई अधिकांश भर्तियों में ओबीसी वर्ग के लिए 27% पद आरक्षित  नहीं थे।

उदाहरणार्थ 'दिल्ली पुलिस' की भर्ती परीक्षा 2023 - जो वर्ष 2023 में विज्ञापित की गई। इस भर्ती के लिए 'दिल्ली पुलिस' ने भर्ती को पूरा करने के लिए इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन 1 सितंबर से 30 सितंबर के बीच लिए गए। दिल्ली पुलिस द्वारा कांस्टेबल पद (संवर्ग) के लिए जारी की गई भर्ती में वर्गवार पदों का विभाजन इस प्रकार से था, जिसे आप नीचे के चित्र में देख सकते हैं - 

दिल्ली पुलिस द्वारा जारी की गई 'कांस्टेबल संवर्ग की भर्ती' के लिए कुल विज्ञापित पद 7547 थे। कुल 7547 पदों में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित पद संख्या मात्र 429 थी। ऐसे में कुल विज्ञापित किए गए पदों में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए पदों का प्रतिशत मात्र 5.68% था। ओबीसी वर्ग को प्राप्त 27% आरक्षण के अनुसार कुल 7547 पद में से 2038 (27%) मिलने चाहिए थे। लेकिन उन्हें मिले मात्र 429 पद, जो 6% से भी कम है। ओबीसी वर्ग के लिए सुरक्षित किए गए 429 पद को देखकर सबके मन मे सवाल उठता है, आखिर यह पद संख्या किस आधार पर निर्धारित की गई? आखिर ऐसा क्या हुआ की ओबीसी वर्ग का 27 प्रतिशत की बजाय 6 प्रतिशत से भी कम आरक्षण रह गया। 

ओबीसी वर्ग को अपने आरक्षण के अनुरुप पद ना मिलने का सिलसिला सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियां तक ही सीमित नहीं है। केंद्र से भी बुरा हाल विभिन्न प्रदेशों की विभिन्न भर्ती एजेंसियों और विभागों द्वारा निकाली जाने वाली भर्तियों में भी देखने को मिल रहा है। उदाहरणार्थ अगर हम राजस्थान में इस समय हो रही शिक्षक भर्ती के हाल को देखे तो यहां केंद्र से भी बुरे हाल देखने को मिल रहे हैं। राजस्थान सरकार की इस भर्ती में कई विषयो में ओबीसी वर्ग के लिए पद ही नहीं निकले, शून्य भर्ती ओबीसी के लिए। कहीं पद तो निकले लेकिन आरक्षण के अनुसार 21% नहीं। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा दिसंबर, 2022 में उच्च प्राथमिक विद्यालय शिक्षक भर्ती के नोटिफिकेशन को देखिए। 

तृतीय श्रेणी अध्यापक सामाजिक अध्ययन, लेवल द्वितीय विशेष शिक्षा के कुल 250 पदों में से ओबीसी के लिए 35 पद निकले जो कुल का 14% है। इसी भर्ती में कई विषय में ओबीसी के लिए एक भी पद नहीं निकला। 


कैसे निर्धारित होता रहा है आरक्षण किसी संवर्ग के भर्ती पदों में? 


जैसा कि आपको पता है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण आजादी के साथ ही मिल गया था और उनके पद भी सरकारी नौकरियों में निर्धारित थे। तब निर्धारित पदो से भर्ती होती थी यानी जिस वर्ग के व्यक्ति ने नौकरी छोड़ दी या रिटायर हो गया तो नई भर्ती खाली हुए पद के व्यक्ति के वर्ग के अनुरुप ही निकलती। उदाहरण के लिए किसी साल में दिल्ली पुलिस के 100 कांस्टेबल रिटायर हुए। अगर रिटायर कांस्टेबल में से 12 अनुसूचित जाति और 19 अनुसूचित जनजाति के थे और शेष समान्य तो नई भर्ती 100 कांस्टेबल के लिए जारी की जाती जिसमें 12 पद अनुसूचित जाति, 19 पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होते, शेष पद समान्य वर्ग के लिए होते। 

वर्ष 1993 में ओबीसी को आरक्षण देने के पश्चात भर्ती में एक नया वर्ग (ओबीसी) जुड़ गया। ओबीसी वर्ग के जुड़ जाने के पश्चात्‌ भर्ती खाली पदों के अनुरुप (जो पहले तक होती रही) नहीं हो सकती थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि ओबीसी वर्ग को 1993 से पहले तक सरकारी नौकरी में कोई आरक्षण नहीं था। ऐसे में किसी ओबीसी कर्मचारी के रिटायर होने से पद खाली होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इस समय तक जो रोस्टर था, अब उसका बने रहना संदिग्ध था क्योंकि एक अन्य प्रकार का आरक्षण (ओबीसी) आ गया, जिससे पहले के वर्गों के पदों में बदलाव संभव था। 

ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने के पश्चात्‌ वर्ष 1997 में भर्ती रोस्टर में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। इससे पहले तक भर्ती के लिए जो रोस्टर उपयोग किया जाता वो रिक्तियों पर आधारित (vacancy based) था। अब भर्ती के लिए नया रोस्टर सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले (आर. के. सब्बरवाल बनाम पंजाब राज्य) के अनुरुप हो गया। इस फैसले के अनुसार आरक्षण आगे के लिए 'रिक्तियों की संख्या' बजाय 'पदों कि संख्या' पर आधारित हो गया। पदों की संख्या पर आधारित रोस्टर तब तक चलता रहेगा जब तक आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की संख्या विभागों के विभिन्न संवर्ग में निर्धारित प्रतिशत तक ना पहुंच जाये।

1997 में जो 'पद आधारित' रोस्टर अपनाया गया उसका मूल उदेश्य किसी संवर्ग (cadre) इसे आप "शिक्षा विभाग के प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और तृतीय श्रेणी (प्रत्येक एक संवर्ग है) कह सकते हैं" में भरे गए पद आरक्षण के अनुपात में भरने से था। साथ ही इसमे यह भी स्पष्ट था कि किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व विशेष संवर्ग में निर्धारित पदों कि संख्या के समान या उससे कम हो सकता है, किंतु अधिक नहीं। इसे आप उदाहरण से यूँ समझे मान लीजिए अगर किसी संवर्ग में कुल पद 100 है तो ओबीसी को आरक्षण के अनुपात में 27 पद मिल सकते हैं, अधिकतम। 27 से कम हो सकते हैं लेकिन अधिक नहीं।


1997 के पहले और बाद के रोस्टर में मुख्य अन्तर - 


1997 से पहले जो रोस्टर रिक्ति आधारित था, बाद में वो बदलकर पद आधारित हो गया। पहले जो पद जिस वर्ग का रिक्त होता था, उसी वर्ग के व्यक्ति की नई नियुक्तियां होती थी किन्तु बाद में पद की संख्या आधारित रोस्टर कर दिया गया। बदले हुए नए रोस्टर से पद आधारित भर्तियां आने लगी यानी जिस वर्ग के जितने पद उतनी भर्ती। 

वर्तमान में क्यो नही मिल रहा ओबीसी को अपना पूरा आरक्षण लाभ - 


वर्ष 2010 के बाद से रोस्टर पंजिका को अपडेट करना बंद कर दिया। इसका अर्थ यह हुआ की अब यह नहीं देखा जाता है कि ओबीसी के लिए निकाले गए पद से कितने लोगों कि नियुक्ति हुई और उसमे से कितने रिटायर हो गए। रोस्टर पंजिका को समाप्त कर देने से 1997 से पहले और बाद के दोनों तरह के रोस्टर स्वत समाप्त हो गए। 

रोस्टर के अनुसार सामान्य पदों पर नियुक्त होने वाले (जो प्रतिभागी किसी आरक्षित वर्ग से संबंध रखते हैं, किन्तु वो प्रतियोगिता से सामान्य श्रेणी में नियुक्त हो जाते हैं) प्रतिभागियों को सामान्य श्रेणी में गिना जाना चाहिए और आरक्षित वर्ग के कोटे से लगे प्रतिभागियों को आरक्षित वर्ग का माना जाना चाहिए। ऐसे में जब नई भर्ती आए तब कोटे से लगे प्रतिभागियों की संख्या के आधार पर पद और आरक्षण निर्धारित किए जाने चाहिए। 

वर्तमान में पद आधारित रोस्टर के नियमो का पालन नहीं होने के कारण ओबीसी वर्ग को सभी भर्तियों में पदों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। रोस्टर पंजिका को अद्यतन (update) नहीं करने के कारण भर्ती निकालने से पूर्व विभाग संवर्ग में कर्मचारियों की गणना वर्गवार कर लेता है, जिसके कारण ओबीसी को नुकसान हो रहा है। 


वर्गवार कर्मचारियों कि गणना से नुकसान - 


वर्ष 2010 के बाद से रोस्टर पंजिका अपडेट नहीं होने के कारण विभाग ना तो 'रिक्ति आधारित' रोस्टर का पालन कर रहे हैं और ना ही 'पद आधारित' रोस्टर के नियमो का पालन हो रहा है। वर्तमान में, सभी विभाग कर्मचारियों की गणना करके से भर्ती निकाल रहे हैं। जिसे आप उदाहरण से यूँ समझ सकते हैं अगर दिल्ली पुलिस कोई नई भर्ती करने जा रही है तब वह यह देखती है कि उसके पास कांस्टेबल संवर्ग में पुलिस कांस्टेबल के एक लाख पद स्वीकृत है (यह माना हुआ है, समझाने के उदेश्य से), जिसमें से 20000 खाली है ऐसे में विभाग सभी खाली पदों पर भर्ती और नियुक्ति करने के लिए विज्ञप्ति जारी करता है तो 'पद आधारित' रोस्टर से ओबीसी वर्ग को 20000 विज्ञापित पद से 27% (5400)मिलने चाहिए। लेकिन रोस्टर का अद्यतन नहीं किए जाने से कुल एक लाख में आरक्षण के अनुपात में 27000 पद ओबीसी वर्ग के होते हैं। ऐसे में भर्ती पूर्व विभागीय गणना में मौजूदा 80,000 कार्यरत पुलिस कांस्टेबल में 27000 या उससे अधिक कांस्टेबल पहले से ही ओबीसी वर्ग के है तो नई भर्ती में ओबीसी का एक भी पद नहीं होगा। यह नियम वर्ष 2010 से रोस्टर का अद्यतन नहीं किए जाने के बाद से लागू है। 

आप सोच रहे होगे कि पहले से ही ओबीसी वर्ग के कांस्टेबल 27000 या इससे अधिक कैसे हो सकते हैं? तो उत्तर है रोस्टर अद्यतन बंद कर देने के बाद कर्मचारियों कि गणना करते समय यह नहीं देखा जाता की कर्मचारी की नियुक्ति ओबीसी वर्ग से हुई या समान्य वर्ग से। इसमे कर्मचारियों का केवल वर्ग देखा जाता है। ऐसे में समान्य वर्ग से भर्ती हुए ओबीसी प्रतिभागियों को भी ओबीसी में गिन लिया जाता है, जिसके कारण निकाले गए पदों कि तुलना में वास्तविक नियुक्ति अधिक हो जाती है, वर्तमान में की जाने वाली विभागीय कर्मचारी गणना प्रणाली से। 

अब ओबीसी वर्ग  के लिए नई चुनौती, नौकरी पाने में - 


अब तक प्रतियोगी परीक्षा में अधिक अंक लाने वाले सभी वर्गों के प्रतियोगी सामान्य वर्ग में समायोजित किए जा रहे हैं, किन्तु आगे ऐसा हो यह जरूरी नहीं है। इसमे बाधा बन सकता है, सुप्रीम कोर्ट का 2019 का फैसला। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एल नागेश्वर राव और न्यायधीश हेमंत गुप्ता कि बेंच ने फैसला दिया कि आरक्षित वर्ग का कोई भी प्रतिभागी अनारक्षित पद पर तभी नियुक्त किया जा सकता है जब उसने आयु सीमा, न्यूनतम योग्यता और परीक्षा फीस कि राशि में छूट न ली हो। 

इस फैसले के लागू होने के बाद जो ओबीसी वर्ग के प्रतियोगी फॉर्म भरते समय स्वयं को ओबीसी का बता जो फॉर्म फीस में छूट पाते हैं, वो परीक्षा के बाद विभाग द्वारा बनाई जाने वाली मेरिट में सामान्य वर्ग से अधिक अंक लाने के बाद भी सामान्य वर्ग में सम्मिलित नहीं किए जाएंगे। साथ ही न्यूनतम योग्यता वाली परीक्षा में जहां सामन्य के मुकाबले में ओबीसी को कम अंक लाने की आवश्यकता हो वो प्रतिभागी भी भर्ती परीक्षा में अधिक अंक लाने के बावज़ूद सामान्य श्रेणी में नियुक्ति नहीं ले पाएंगे। उदाहरण के लिए REET में सामान्य वर्ग के परीक्षार्थियों को 60% अंकों की आवश्यकता होती है उत्तीर्ण होने के लिए। आरक्षित परीक्षार्थियों में एससी, एसटी और ओबीसी को 55% ऐसे में भर्ती परीक्षा में आरक्षित वर्ग का वो प्रतियोगी सामान्य वर्ग की कट-ऑफ से अधिक अंक ले आता है जिसके REET (योग्यता परीक्षा में) में 60% से कम है वो समान्य पद पर भर्ती नहीं हो पाएगा। 

अगर 2019 का फैसला पूरी तरह से लागू हो जाए तो ओबीसी वर्ग के परीक्षार्थियों को नियुक्ति मिल पाना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि एक तो भर्ती में पद आते ही नहीं अगर आते हैं तो नाममात्र के। दूसरी ओर अभ्यर्थी ने फॉर्म भरते समय खुद को ओबीसी बताया तो फीस में छूट मान उस अभ्यर्थी को सामान्य वर्ग में नियुक्ति नहीं मिल सकती है। ऐसे में ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों लिए सरकारी नौकरी में नियुक्ति पाना चुनौती भरा कार्य हो जाएगा। ऐसे में कोई खुद को जनरल बता अधिक फीस दे नौकरी प्राप्त कर ले तब भी वह खुद को विभागीय गणना में ओबीसी बता दे तो निर्धारित कोटे में उसकी गणना हो जाएगी। 

सिर्फ इतना ही नहीं है, इसके अतिरिक्त भी कारण है, जो ओबीसी को नौकरी देने में बाधा बन रहे हैं। दिव्यांग, विशिष्ट ज़न और खेल कोटे को भी नियुक्ति के समय ओबीसी वर्ग के पदो को काट कर नियुक्ति दे दी जाती है, जिससे ओबीसी के थोड़े बहुत पद होते हैं वो पूरी तरह से समाप्त ही हो रहे हैं। 

क्या है इसका निदान? 

सरकार को आवश्यकता है कि जो प्रतिभागी ओबीसी वर्ग के होते हुए सामान्य वर्ग से नौकरी हासिल कर लेते हैं, उन्हें ओबीसी की बजाय सामान्य श्रेणी का माना जाना चाहिए। ऐसा करने से ही ओबीसी के लिए पद आ सकते हैं, अन्यथा ओबीसी वर्ग सिर्फ काग़जों में सीमित हो जाएगा भर्तियों में नहीं। 

सरकार को चाहिए की ओबीसी वर्ग को आरक्षण का लाभ देने के लिए पुनः 'पद आधारित' रोस्टर को बहाल कर देना चाहिए। जितने भी कुल पद है, उनमे सभी वर्गों को उनके आरक्षण के आधार पर पद देने चाहिए। जो पद भर्ती प्रक्रिया के बाद खाली रह जाए, उन्हें बैकलॉग मानते हुए उन पदो को अगली भर्ती में पुनः निकाला जाना चाहिए, ना की विभागीय गणना कर विभाग पद निकालते रहे। 


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न -


प्रश्न: रोस्टर पंजिका क्या है? 

उत्तर: रोस्टर पंजिका एक विधि है, जिसके जरिए नौकरियों में आरक्षण लागू कर पदों का निर्धारण किया जाता है। इसका जिक्र भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) में किया गया है। 

प्रश्न: 2010 के बाद से रोस्टर पंजिका का अद्यतन (अपडेट) क्यों नहीं हुआ? 

उत्तर : विभागों द्वारा कर्मचारियों की वर्ग वार गणना किये जाने के कारण पदौन्नति समस्याओं को देखते हुए रोस्टर पंजिका को अपडेट करना बंद कर दिया। 

प्रश्न: 1997 से पहले के और बाद के रोस्टर में मुख्य अन्तर क्या है? 

उत्तर : 1997 से पहले का रोस्टर रिक्तियां (vacancy) आधरित था, वही 1997 के बाद का रोस्टर पद संख्या (post) आधारित हो गया।

प्रश्न: ओबीसी वर्ग क्यों नहीं मिल रहा है पूरा 27% आरक्षण? 

उत्तर: वर्ष 2010 के बाद से रोस्टर पंजिका को अपडेट नहीं किए जाने के कारण भर्ती निकालने से पूर्व विभाग कर्मचारियों कि वर्गवार गणना करता है, जिसके कारण ओबीसी को 27%आरक्षण नहीं मिल रहा है। 

प्रश्न: ओबीसी वर्ग को आरक्षण कब (तिथि) मिला है? 

उत्तर: वर्ष 1990 में 6 अगस्त को प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने ओबीसी को 27%  आरक्षण देने की घोषणा की, जिसकी अधिसूचना 13 अगस्त, 1990 को जारी हुई। 

प्रश्न: ओबीसी वर्ग को आरक्षण किस प्रधानमंत्री के कार्यकाल में मिला? 

उत्तर: वी पी सिंह। 

प्रश्न : राजस्थान में ओबीसी वर्ग को कितना आरक्षण है? 

उत्तर : राजस्थान में ओबीसी वर्ग को 21% आरक्षण हैं ।
 

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