हाल ही में भारत में हुआ इंडिया एआई समिट निजी विश्विद्यालय के साथ ही एक प्रमुख आई टी कंपनी द्वारा की गई चूक के कारण सुर्खियों मे बना बना हुआ। दोनों ने चीनी उत्पाद को अपना बता मीडिया के सामने दावे ऐसे किए जैसे कोई डिटर्जेंट के विज्ञापन में सफेदी की चमकार के दावे किए जाते हैं।
AI summit में की गई इस गलती के बाद कंटेंट के लिए तरसते सोशल मीडिया इन्फ्लूसर यूँ टूट पड़े जैसे स्वच्छ शरीर पर एक छोटे से घाव पर मक्खियाँ। ये लोग तो ऐसे दावे लेकर सोशल मीडिया पर चेहरा चमकाने से अपने शब्दों की धार देते रहे जैसे दुनियां में AI के सबसे बड़े ज्ञाता यही है।जिन्हें इस गलती से पहले AI की जानकारी तक नहीं थी (हालांकि आज भी नहीं है। वह इस गलती के बाद चार खबरे पढ़ने के साथ चार वीडियो देख खुद को ही इसमे पीएचडी समझने लगे। ऐसे लोगों ने AI Summit को पूरी तरह से घुमा कर ही रख दिया। इनकी गलती से AI की बाते यूँ खो गई जैसे राजनैतिक पार्टियों के वादे सत्ता मिलने के बाद खो जाते हैं।
पूरी गलती के लिए कौन जिम्मेदार -
कई लोग इसके लिए आयोजन समिति को इसके लिए जिम्मेदार समझ रहे हैं लकिन आयोजन समिति इसके लिए जिम्मेदार नहीं है, यह हमारा दावा नहीं है। ऐसा दावा AI के जानकारो द्वारा किया जा रहा है। टेक उद्योग के विशेषज्ञ N. Chandrasekaran का कहना है कि किसी भी उत्पाद की प्रामाणिकता की जिम्मेदारी प्रस्तुत करने वाली संस्था की होती है, आयोजकों की नहीं। इनकी बात काफी हद तक नहीं बल्कि पूर्ण सत्य है।
हालांकि मीडिया भी टीआरपी के चलते इस पर बात करने को तत्पर नहीं है, जो बात उसे करनी चाहिए। AI समिट आखिर तकनीकी उत्पादों मे उलझा आम आदमी के सामने परोसी जा रही है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस वक्त सोशल मीडिया में AI को लेकर जो पोस्ट और वीडियो है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि चीनी निर्मित RoboDog ही AI है, जबकि हकीकत में उसका सम्बन्ध AI से उतना ही है, जितना आम के पेड़ का क्रिकेट से। गलगोटिया विश्विद्यालय और विप्रो के दावे का सम्बन्ध भी समिट से उतना ही है, जितना पेंट का दिवार की मजबूती से।
तकनीकी उपकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) दो अलग अवधारणाएँ हैं। किसी रोबोटिक उत्पाद का एआई से उतना ही संबंध हो सकता है, जितना किसी उपकरण का उसके उपयोग के तरीके से। इसी तरह, Galgotias University और Wipro द्वारा किए गए दावों को भी समिट की मूल भावना से अलग कर देखना आवश्यक है। असली सवाल यह है कि तकनीकी जागरूकता और पारदर्शिता की जिम्मेदारी आखिर किसकी है—प्रस्तुतकर्ता की, आयोजकों की, या फिर सूचना प्रसारित करने वालों की? AI समिट में आधे अधूरे कंटेंट परोसने वालों को अंदर तक जाने की छूट आखिर कैसे मिल गई? यह सवाल अब भी जस का तस खड़ा हैं।
क्यों खड़ा हुआ अनायास विवाद -
जहां तक चीनी RoboDog का सवाल है, उसका सीधा संबंध कृत्रिम बुद्धिमत्ता से नहीं जोड़ा जा सकता। एक रोबोटिक डॉग एक हार्डवेयर उत्पाद हो सकता है, जिसमें सेंसर, मोटर और पूर्व-निर्धारित प्रोग्रामिंग हो, लेकिन हर रोबोट अपने आप में उन्नत AI का उदाहरण नहीं होता। फिर भी AI के नाम पर RoboDog को विवाद से जोड़ देना वैसा ही है जैसे किसी चिकित्सक की विशेषज्ञता को केवल एक्स-रे मशीन से जोड़कर देखना। मशीन एक उपकरण है, बुद्धिमत्ता या निर्णय क्षमता का मूल स्रोत नहीं।
इस पूरे प्रकरण में जहां चर्चा तकनीकी क्षमता, शोध और वास्तविक नवाचार पर होनी चाहिए थी, वहां दिखावे और प्रस्तुति को ही बुद्धिमत्ता का प्रतीक मान लिया गया। परिणामस्वरूप पूरा समिट अनावश्यक विवादों में घिर गया। यह स्थिति स्वाभाविक कम और सुनियोजित अधिक प्रतीत होती है, क्योंकि ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाकर प्रतीकात्मक चीजों पर केंद्रित कर दिया गया। जहां AI की बात होती है तो वहाँ दिमाग सबसे पहले ChatGPT की तरफ जाता है, जरा सोचो इस ChatGPT को मोबाइल के साथ जोड़ दे तो फिर OpenAI (ChatGPT ki की निर्माता कंपनी) अपने आप में कैसे उन्नत AI होगा। खैर, यह बात वही जानता है जो AI की जानकारी रखता हो, RoboDog पर कटाक्ष करने वाले भी Galgotia University के मेहनती और होनहार छात्र ही प्रतीत हो रहे हैं, इस खेल में।
पूरे मुद्दे में और अधिक चिंताजनक यह है कि कुछ लोग, जिनके पास पत्रकारिता का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है, स्वयं को सबसे तेज और प्रभावशाली आवाज बताकर इस विवाद को और हवा दे रहे हैं। शब्दों की तीक्ष्णता और आरोपों की तीव्रता को ही सत्य का प्रमाण मान लिया गया है। जबकि किसी भी तकनीकी विषय पर गंभीर विमर्श तथ्यों, विशेषज्ञता और संतुलित विश्लेषण पर आधारित होना चाहिए, न कि उत्तेजक दावों और अधूरी जानकारी पर।
आखिर बचकाने इन्फ्लूसर को एंट्री क्यों?
भारत में आयोजित AI समिट का उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वास्तविक नवाचारों को मंच देना था, लेकिन कुछ मीडिया मंचों ने AI शोध और एल्गोरिदमिक उपलब्धियों की बजाय सामान्य तकनीकी उत्पादों को ही प्रमुखता से प्रस्तुत किया। इसी बीच कुछ तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स ने विषय की गंभीरता समझे बिना केवल रील और सनसनी पर ध्यान केंद्रित किया। जब एक चीनी सोशल मीडिया हैंडल ने RoboDog को चीनी उत्पाद बताया, तो बिना तथ्य-जांच के नकारात्मक प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ला दी गई। पूरे आयोजन को एक उत्पाद के विवाद से जोड़ देना न तो तर्कसंगत था और न ही जिम्मेदार पत्रकारिता का उदाहरण।
कई लोगों को Artificial Intelligence की मूल अवधारणाओं—जैसे मशीन लर्निंग, न्यूरल नेटवर्क या डेटा मॉडल—का आधारभूत ज्ञान तक नहीं था, फिर भी उन्हें विशेषज्ञ की तरह मंच और प्रवेश दिया गया। सवाल यह उठता है कि ऐसे व्यक्तियों को किस मानदंड पर आमंत्रित किया गया। गंभीर तकनीकी विमर्श की जगह भावनात्मक आरोपों और आधी-अधूरी जानकारी ने ले ली। इससे वास्तविक शोधकर्ताओं और स्टार्टअप्स के काम पर अनावश्यक संदेह उत्पन्न हुआ।
कुछ इन्फ्लुएंसर्स द्वारा स्टॉल पर हंगामे, तोड़फोड़ के आरोप और उत्पादों को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा। इससे न केवल AI क्षेत्र की साख प्रभावित हुई बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की छवि पर भी प्रतिकूल असर पड़ा। किसी भी वैश्विक तकनीकी आयोजन में आलोचना स्वागतयोग्य है, परंतु वह तथ्यों, समझ और जिम्मेदारी पर आधारित होनी चाहिए—न कि सनसनी और वायरल होने की चाह पर।
देश के सम्मान के लिए इन्फ्लुएंसर्स के कैमरे बंद करे -
सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, लेकिन इसकी उपयोगिता तभी तक है जब तक यह जिम्मेदारी और संतुलन के साथ प्रयोग किया जाए। जैसे ही सीमाएँ टूटती हैं, यही माध्यम कष्टदायी और भ्रम फैलाने वाला बन जाता है। किसी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के दौरान, जहाँ देश की प्रतिष्ठा और वैश्विक छवि दांव पर हो, वहाँ तथ्यों की जगह सनसनी और अधूरी जानकारी को बढ़ावा देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे अवसर राष्ट्र की उपलब्धियों, नवाचारों और सकारात्मक प्रयासों को दुनिया के सामने रखने के लिए होते हैं, न कि उन्हें मूल उद्देश्य से भटका देने के लिए। जब आयोजन की गंभीरता को नजरअंदाज कर उसे विवादों और वायरल सामग्री तक सीमित कर दिया जाता है, तो इससे वास्तविक उद्देश्य छिन्न-भिन्न हो जाता है।
इन्फ्लुएंसर्स समाज में प्रेरणा, जागरूकता और सकारात्मक संवाद के वाहक हो सकते हैं। परंतु यदि वे प्रेरणा देने के बजाय नकारात्मकता को प्राथमिकता दें, तो समाज और राष्ट्र दोनों को अपनी प्राथमिकताएँ स्पष्ट करनी चाहिए। आलोचना लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन वह तथ्यों, अध्ययन और समझ पर आधारित होनी चाहिए। केवल लोकप्रियता या व्यूज़ की चाह में फैलाया गया भ्रम दीर्घकालिक नुकसान पहुँचाता है। इसलिए नकारात्मकता से किनारा करने के लिए आवश्यक है कि जिम्मेदार और विषय-विशेषज्ञ आवाज़ों को ही प्रमुखता दी जाए।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन लोगों को किसी विषय का मूलभूत ज्ञान तक नहीं, उन्हें किस आधार पर विश्लेषक या प्रतिनिधि का दर्जा दिया जाता है। बिना योग्यता और समझ के दी गई ऐसी भूमिका आयोजन और देश दोनों के हितों के विपरीत जाती है। भविष्य में ऐसे कृत्यों से निपटने के लिए स्पष्ट मानदंड, जवाबदेही और जिम्मेदार चयन प्रक्रिया अपनाना आवश्यक होगा।
मीडिया को भी लेनी होगी जिम्मेदारी -
मीडिया की ओर से AI समिट की कवरेज में स्पष्ट खामियाँ दिखाई दीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अवधारणा, उसके शोध, एल्गोरिद्म, डेटा मॉडल और वास्तविक अनुप्रयोगों पर चर्चा करने के बजाय ध्यान मुख्यतः प्रदर्शित उत्पादों पर केंद्रित रहा। यह सवाल उठना चाहिए था कि किसी उत्पाद में AI किस स्तर पर और किस तकनीकी आधार पर जोड़ी गई है, लेकिन ऐसे मूलभूत प्रश्न प्रायः अनुपस्थित रहे। परिणामस्वरूप दर्शकों के सामने बुद्धिमत्ता की वैज्ञानिक समझ के स्थान पर केवल दृश्य आकर्षण और दावे प्रस्तुत किए गए। इससे न केवल विषय की गंभीरता कम हुई बल्कि आयोजन का बौद्धिक स्तर भी प्रभावित हुआ।
इसके अतिरिक्त मीडिया को यह सावधानी रखनी चाहिए थी कि कवरेज समिट के मूल उद्देश्य से न भटके। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय आयोजन का लक्ष्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि विचार-विमर्श, नीति निर्माण, सहयोग और नवाचार को बढ़ावा देना होता है। जब रिपोर्टिंग का फोकस सनसनी, विवाद या सतही प्रस्तुतियों पर केंद्रित हो जाता है, तो मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। यही भटकाव अंततः भ्रम और अनावश्यक विवादों को जन्म देता है, जिसका प्रभाव आयोजन की साख और देश की छवि दोनों पर पड़ता है।
मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे विशिष्ट क्षेत्रों की कवरेज संबंधित विशेषज्ञों से कराएँ। केवल कैमरा या माइक संभाल लेना किसी को तकनीकी विश्लेषक नहीं बना देता। AI जैसे जटिल और उभरते क्षेत्र की रिपोर्टिंग के लिए विषय-विशेषज्ञता, तैयारी और तथ्य-जांच अनिवार्य है। यदि थोड़ी अधिक सावधानी, अध्ययन और जिम्मेदारी दिखाई जाती, तो स्थिति इतनी विवादास्पद न बनती। अब आवश्यक है कि मीडिया आत्ममंथन करे और भविष्य के लिए अधिक पेशेवर एवं विशेषज्ञ-आधारित दृष्टिकोण अपनाए।


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