नाता प्रथा : विभिन्न भ्रांतियां और सच्चाई

नाता प्रथा राजस्थान में बहुतायत पायी जाने वाली एक प्रथा है। इसे लेकर समाज और आधुनिक मीडिया जगत में विभिन्न प्रकार कि भ्रांतियां है। आधुनिक मीडिया जगत तो इसे लिव-इन तक करार दे देता है, तो राजस्थान के अन्यत्र प्रदेशों के कई लोग इसे बहुविवाह कि एक पद्धति मानते हैं। राजस्थान कि इस विशिष्ट प्रथा को लेकर लोग सोशल मीडिया से समाचारों पत्रों के आलेखों के माध्यम से तो कभी टीवी के रंगीन पर्दों पर बैठे लोग अजीबोगरीब तर्क देते हैं और इसे एक कुरीति मानते हैं।


आइये जानते हैं क्या है, नाता प्रथा?


राजस्थान कि विशिष्ट नाता प्रथा को बेहतर तरीके से जानने से पूर्व आपको राजस्थान के विभिन्न समाजों और जातियों कि विशिष्ट और स्थापित मान्यताओं को समझना होगा, आप इन स्थापित मान्यताओं को बिना समझे इस विशेष रिवाज को पूर्णतया नहीं समझ सकते हैं, इसलिए पहले इन्हें समझिए -

कन्या को जीवनकाल में एक बार तेल चढ़ता है - राजस्थान कि एक स्थापित मान्यता है कि कन्या कि उसके संपूर्ण जीवनकाल में केवल एक बार ही शादी हो सकती है। जिसके कारण उसकी शादी कि रस्मों को भी एक बार ही निभाया जा सकता है, बार-बार नहीं। 
विधवा और परित्यक्ता को दूसरे मर्द के साथ घर बसाने का अधिकार - राजस्थान में कई जातियां ऐसा मानती आई है कि एक विधवा महिला अपने पति कि मृत्यु के बाद किसी अन्य मर्द के साथ अपना घर बसा सकती है। तो वही दूसरी तरफ परित्यक्ता महिला को भी पुनः घर बसाने का अधिकार है, हालांकि पूर्व में परित्यक्ता होने का कोई प्रश्न सामने नहीं आता है, ऐसे में हम कह सकते हैं कि विधवा को पुनः घर बसाने का अधिकार था। 
शादी और गौना - जहां बाल विवाह (राजस्थान में बाल विवाह होता  आया है) होता है, वहाँ बचपन में लड़की की शादी होने के बाद उसे ससुराल नहीं भेजा जाता है और ना ही वो अपने पति के साथ पत्नी के रुप में रहती है। एक तरीके से बाल विवाह सगाई जैसी ही रस्म है, ऐसे में जिनका बाल-विवाह होता है उस युगल के बालिग होने पर एक और रस्म होती है जिसे गौना कहा जाता है, इसे आप वर्तमान शादी समझ सकते हैं। गौना होने के बाद लड़की अपने ससुराल जाती है और इसके बाद बाल विवाह वाले युगल को पति-पत्नी कि भाँति रहने का अधिकार प्राप्त होता है। 

उपर्युक्त मान्यताएं उन सभी समाज और जातियों में पायी जाती है, जहां नाता प्रथा प्रचलित रही है। इन्हीं विशिष्ट और अनोखी मान्यताओं के चलते विधवा महिलाओं कि दूसरी शादी का एक विशिष्ट तरीका निकाला नाता-प्रथा, जिससे ना समाज कि स्थापित मान्यताओं पर विपरीत प्रभाव हो और ना ही विधवा बालिका अथवा महिला को पूरी जिंदगी विधवा कि तरह ना निकालना पड़े। 


क्या है नाता प्रथा? 


नाता प्रथा एक ऐसी प्रथा है जिसमें कोई कोई विवाहित महिला किसी दूसरे मर्द के साथ बिना विवाह किए विशिष्ट रस्मों का निर्वाह कर विवाहित महिला कि भाँति अधिकार प्राप्त कर उसके साथ रहने लगती है। वह दूसरे साथी पुरुष से संतति पैदा करने के साथ ही उसकी संपत्ति में बराबर का अधिकार प्राप्त कर सकती है। नाता प्रथा का पालन करने वाली महिला को वो सभी अधिकार प्राप्त होंगे जो किसी महिला को किसी पुरुष से शादी करने के बाद पति से प्राप्त होते हैं, ऐसे में दोनों में अन्तर महज शादी के तरीके, रीति-रिवाजों और रस्मों का होता है। 

 नाता प्रथा राजस्थान में पायी जाने वाली एक ऐसी प्रथा है, जिसमें एक विवाहित महिला अपने पति कि मृत्यु के बाद या अपने पति से तलाक लेने के बाद किसी दूसरे पुरुष के साथ समाज के स्थापित नाता प्रथा के रीति-रिवाजों से एक पत्नी कि भाँति इसलिये चली जाएं ताकि वो अन्य विवाहित महिला कि भाँति अपना परिवार बसा सके और अपने अंधकारमय जीवन में ज़िन्दगी के रंग भर सके। इस प्रथा को मान्यता देने वाले समाज और जातियों में किसी बालिका के पति कि मृत्यु के बाद उसे सामाजिक रीति-रिवाज से दूसरा विवाह करने का अधिकार जिस रिवाज से प्राप्त है, उसे आधिकारिक तौर पर समाज नाता प्रथा के रुप में मान्यता देता है। 

लिव-इन और शादी में अन्तर - 


अगर दोनों के अंतरों को स्पष्ट रुप से देखा जाए तो कुछ महत्त्वपूर्ण अन्तर इस प्रकार हैं - 
  • विवाह कि योग्यता - लिव-इन में कोई भी युवती और युवक रह सकते हैं। जबकि नाता प्रथा में वही युवक और युवती रह सकते हैं, जिनका एक बार विवाह पूर्व में हो चुका हो अतः वही योग्य है, जो पहले किसी और से विवाहित थे। 
  • अधिकारों कि प्राप्ति - लिव-इन में रहने वाली युवती को अपने साथी से पति के रुप में अधिकारों कि प्राप्ति हो यह आवश्यक नहीं है, किंतु नाता प्रथा में युवती को अपने साथी से पत्नी के समान सभी अधिकारों कि प्राप्ति होती हैं। 
  • समाज कि मान्यता - लिव-इन को समाज कोई मान्यता प्रदान नहीं करता है, किंतु नाता प्रथा को समाज मान्यता प्रदान करता है, और उन्हें पति और पत्नी के रुप में वे सभी अधिकार प्रदान करता है, जो एक विवाहित युगल को प्राप्त होते हैं। नाता प्रथा में युवक युवती के परिजनों कि सहमती कि आवश्यकता है, उनकी सहमति से समाज कि मान्यता अनुरुप विवाह का एक विकल्प है जबकि लिव-इन विवाह का कोई विकल्प नहीं। 
  • रीति-रिवाज और प्रचलन - लिव-इन में रहने के लिए किन्ही स्थापित रीति-रिवाजों का पालन करने कि आवश्यकता नहीं होती है, और ना हीं यह कोई युवक युवती के साथ रहने का प्रचलित रिवाज है। किंतु नाता प्रथा के लिए स्थापित रीति रिवाजों का पालन करना आवश्यक है, आवश्यक रीति-रिवाजों के कारण यह राजस्थान में दूसरी शादी करने का एक प्रचलित रिवाज रहा हैं। 
  • शर्तें और कारण - लिव-इन कोई भी कर सकता है, किंतु नाता केवल विवाहित ही कर सकते हैं। विवाहित महिला द्वारा दूसरा विवाह ना करने के रिवाज से नाता प्रथा कि उत्पत्ति हुई, दूसरे विवाह के विकल्प के रुप में। वही लिव-इन के लिए ऐसी कोई विशिष्ट शर्तें नहीं है ना ही लिव-इन में रहने का कोई स्पष्ट और प्रचलित ऐसा कारण है जिसे समाज कोई मान्यता दे सकें। 

आइये उदाहरण से समझते हैं - 


एक गांव मे काली नाम कि एक बालिका कि शादी सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ दूसरे गॉव में किसी युवक से हो जाती है, शादी के कुछ दिन बाद काली के पति कि अकाल मृत्यु हो जाती है। उस वक्त ना तो काली को कोई सन्तान है और ना ही सन्तान कि कोई आशा। इस मुश्किल घड़ी में काली के सामने दो विकल्प है, या तो वो बिना सन्तान के अपने ससुराल या पीहर में बिना सन्तान सुख के पूरी जिंदगी एक विधवा के रुप में गुजारे अन्यथा चाहे तो दूसरा विवाह (नाता) करे। 

दूसरा विवाह.... समाज दूसरे विवाह कि रीति-रिवाज के मुताबिक एक महिला को अनुमति नहीं देता। ऐसे में उसे विवाह के विकल्प के तौर पर अन्य गॉव के युवक सोनू के साथ नाता करा दिया जाए। सोनू कि भी पहले शादी हो रखी थी, और उसकी पत्नी कि मृत्यु हो गई। ऐसे में सोनू से उसका नाता संभव है। 

नाता कि बुराई - 


नाता प्रथा विवाह का एक विकल्प है शुद्ध रुप से विवाह नहीं ऐसे में यह विवाह से थोड़ा अलग है, जो इस प्रकार हैं। 

लड़की का विवाह एक बार ही होता है, पुनः विवाह के तौर पर उसका नाता ऐसे पुरुष से होता है जिसका भी एक बार पूर्व में विवाह हो चुका हो ऐसे में युवती के सामने साथी चयन में सीमाएँ आ जाती है, दूसरी तरफ विधुर पुरुष कुंवारी कन्या से भी विवाह कर सकता है किन्तु विधवा महिला किसी विवाहित और विधुर ( जिसका पूर्व में एक बार विवाह हुआ हो, पत्नी जिवित हो या ना हो, साथ रहती हो या अलग इनका कोई प्रभाव नहीं) से ही नाता कर सकती है। ऐसे में कई बार उपयुक्त साथी नहीं मिलता तो कई बार ऐसे साथी से नाता हो जाता है, जिसके पहले से पत्नी हो लेकिन सन्तान नहीं हो अथवा ऐसे व्यक्ति से भी नाता हो जाता है जिसके पहले से ही सन्तान हो लेकिन पत्नी कि मृत्यु हो गई हो। 

नाता प्रथा में जो विशेष है वह यह है कि कई जातियों में पहले से ही कुछ सीमाओं के साथ अपने परिजनों कि अनुमति से विधवा को पुनः अपना घर बसाने कि अनुमति थी। वो सन्तान सुख के साथ एक पत्नी के रुप मे वे सभी अधिकार प्राप्त कर सकती थी जो एक सुहागन को प्राप्त होते हैं तथा जो कानून के द्वारा एक पत्नी को प्राप्त है। यहां विवाह से इसका भेद योग्यता और रिवाजों के आधार पर होता है, ना कि अधिकारों के आधार पर। 

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