कांग्रेस के नेता दल बदल क्यों जा रहे हैं बीजेपी में? दल बदल

देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेताओं द्वारा हर हफ्ते अपना पाला बदल बीजेपी में शामिल होने का सिलसिला पिछले 4-5 बरसों से जारी है। अब लोकसभा चुनावो को देखते हुए विभिन्न राज्यों से ख़बरें आने लगी है कि आखिर यह सभी कांग्रेस के नेता पाला बदल बीजेपी में क्यो जा रहे हैं? लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस नेताओ द्वारा अपनी पार्टी को अलविदा कहकर जिस संख्या में बीजेपी जॉइन की है, वह संख्या बता रही है कि आजादी के बाद इस वर्ष सर्वाधिक दल बदल हुए हैं, चुनाव से पहले। 

कांग्रेस के नेता दल बदल क्यों जा रहे हैं बीजेपी में? दल बदल


ऐसा नहीं है कि दल बदल देश में पहली बार हो रहा है, पहले भी ऐसा होता रहा है, कई पार्टी के नेता अपना पाला बदल किसी दूसरी पार्टी में जाते रहे हैं, लेकिन इस समय जो देखने को मिल रहा है वो सिर्फ एक ही पार्टी के नेताओ का पाला बदल दूसरी पार्टी में जाने का नियमित क्रम बना हुआ है। जितने नेता पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं, उतने शायद ही किसी दौर में अपनी पार्टी को छोड़ किसी और पार्टी में गए हों। इसे लेकर आपके मन में प्रश्नो का तूफान उठता होगा ही, तो आइये जानते हैं आखिर क्यों हो रहा है ऐसा? 


क्या कहती है कांग्रेस और विपक्ष के दल - 


इस मुद्दे पर अक्सर चर्चा होती रहती है। कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं से टीवी की लाइव डिबेट में भी पूछा जाता है कि आपकी पार्टी के नेता, आपको और आपकी पार्टी को छोड़कर बीजेपी में क्यो जा रहे हैं? तब पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं से यह कहते सुना जाता है कि वो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) कि मशीन में अपने दाग धोने के लिए जा रहे हैं। कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता बीजेपी को वाशिंग मशीन और पार्टी छोड़ रहे नेता को भ्रष्टाचारी बता तर्क देते हैं कि यह तो बीजेपी की वाशिंग मशीन में भ्रष्टाचार से मुक्त होने गया। 

कांग्रेस द्वारा पार्टी छोड़ने वाले नेताओ को भ्रष्टाचारी और बीजेपी को वाशिंग मशीन बता इस तरह की बात करना अपनी हताशा को प्रकट करना मात्र है। कांग्रेस का यह तर्क कितना कुतर्क है, यह कांग्रेस खुद नहीं समझ रही है या कोई अन्य कारण है, इसके बारे में कोई दूसरा क्या कह सकता है? इस ब्यान से काँग्रेस में अब भी जमे हुए नेताओ पर कैसा और कितना असर होता है? यह भी वो नेता ही जाने लेकिन जो जान जाते हैं वो भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए बीजेपी में चले जाते हैं। इसे आप यूँ कह सकते हैं जो भ्रष्टाचारी है वो कांग्रेस में है, इससे मुक्त होना है तो बीजेपी में जाओ। कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता खुद ही कह देते हैं जो भ्रष्टाचारी और उन्हें अब भी भ्रष्टाचार करने की उम्मीद है वो कांग्रेस में जमे हुए हैं, जिनका मन भर गया हो बीजेपी में जा खुद को पाक साफ कर रहे हैं। 

लेकिन देश के बुद्धिजीवी इसे कुछ और ही मानते हैं। साथ ही पिछले सालो के आंकड़ों और तथ्यों को देखा जाए तो कई कारण सामने आए हैं। सभी कारणों पर चर्चा नहीं की जा सकती है, लेकिन कुछ कारण निम्नलिखित है - 

बीजेपी का बढ़ता जनाधार - 


बीजेपी का जनाधार 2014 के बाद से लगातार बढ़ता जा रहा है। पूरे भारत में बीजेपी का जनाधार बढ़ा है। कई राज्यों में बीजेपी का जनाधार इस कदर बहुत ही तेजी से बढ़ा की लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अलावा कोई दूसरी पार्टी अपना खाता खोलने का सोच भी नहीं सकती। बीजेपी के बढ़ते जनाधार के कारण ही बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में 31.1% के मुकाबले में 2019 के लोकसभा चुनाव में 37.43% मत प्राप्त हुआ। कई राज्यों में बीजेपी के सभी प्रत्याशी (लोकसभा चुनाव) 2014 और 2019 में जीते हैं। उन सभी राज्यों में बीजेपी प्रत्याशी के जीत का अन्तर 2014 के मुकाबले में 2019 में अधिक रहा। इसी जनाधार को देखते हुए कई नेता अपनी पार्टी छोड़ (खासतौर से काँग्रेस नेता) बीजेपी की तरफ रुख कर रहे हैं, ताकि राजनैतिक अवसर का फायदा बीजेपी के जनाधार से उठा सके। 

कांग्रेस में अनदेखी -


कई कांग्रेस पार्टी के पूर्व नेता जो अब बीजेपी में है, वो कांग्रेस पार्टी में अपने ही नेताओ द्वारा अपनी अनदेखी के कारण कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी में आ गए। हिमंता बिस्वा शर्मा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, पेमा खांडू और माणिक साहा आदि। ऐसे ही वर्तमान में राजस्थान के महेंद्रजीत सिंह मालवीया भी अनदेखी के चलते कांग्रेस छोड़ बीजेपी में चले गए। इनमें से अधिकांश वो नेता है जिनका अपना जनाधार रहा और पार्टी के लिए विपरीत परिस्थितियों के होने के बावजूद चुनाव को जीता है। कई कांग्रेस के नेता अपनी अनदेखी का आरोप आज भी लगा रहे हैं, उनके द्वारा भविष्य में किसी भी वक्त पाला बदला जाता है तो इस बात पर मुहर ही लग जाती है कि कांग्रेस अपने नेताओ की अनदेखी करती है। 


विचारधारा विहीन होना कांग्रेस के लिए नुकसानदायक - 


कांग्रेस की विचारधारा किस वक्त क्या होती है? कब किसके साथ खड़ी हो जाती है, कब किसका विरोध कर देती है, कोई नहीं जानता हैं? कांग्रेस कि विचारधारा और किसी मुद्दे पर इसके स्टैंड और वक्तव्य का कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता है। यहीं कारण है कि कई बार एक गुट कोई निर्णय लेता है तो दूसरा उसे तत्काल पलट देता है। ऐसे में कई लोग इस वज़ह से परेशान होते हैं कि उन्हें करना क्या है? किस गुट के साथ रहना है। एक गुट किसी का सर्मथन कर रहा है, उसके साथ या विरोध करने वाले विरोधी पक्ष के साथ। कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक महासचिव घोषणा करते हैं कि कांग्रेस टैक्स कम करेगी तो दूसरी ओर बड़े नेता ट्वीट कर देते हैं, कांग्रेस विरासत कर शुरु कर देगी। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कहते हैं कि कांग्रेस धर्म की राजनीति नहीं करेगी, अगले ही दिन कांग्रेस का एक दल मंदिर, मस्जिद पहुंच जाता है, ऐसे में कांग्रेस की कनफ़्यूशियस विचारधारा को छोड़ कई नेता स्पष्ट विचारधारा वाली बीजेपी का रुख कर रहे हैं। 

कार्यकर्ताओं का बदलता रुख -


विचारधारा विहीन कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता किसी एक बिन्दु पर सहमत नहीं होते हैं, कभी भी। ऐसे में कांग्रेस के कार्यकर्ता के साथ जनाधार रखने वाले नेताओं के समर्थक भी भ्रमित होते हैं। दूसरी ओर बीजेपी के बढ़ते के जनाधार के कारण कांग्रेस कई राज्यों से गायब हो चुकी है तो कहीं सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो रही है। नेता तो अगले चुनाव का इंतजार कर सकता है लेकिन कार्यकर्ता अपना काम होने के लिए अगले चुनाव तक इंतजार कर भी ले तो उनका नेता जीत जाने के बाद उसके नेता कहे यह कांग्रेस की विचारधारा नहीं। ऐसे में कार्यकर्ताओं के बड़े समूह कांग्रेस से टूट बीजेपी की तरफ जा रहा है, तो उनके पीछे नेता भी चलने लगे हैं। जब किसी नेता के खास समर्थक ही पार्टी में नहीं रहे किनारा करने लगे तो नेता किसका नेता रहेगा? यह सोचने वाली बात है, लेकिन कांग्रेस इस बात पर विचार तक नहीं करती की आखिर उसके समर्थक उन्हें क्यों छोड़ रहे हैं? जो नेता जीत का विश्वास रखते हैं वो कार्यकर्ताओं के साथ बीजेपी में जा जीतने की सोचने लगे हैं। 


दल-बदल कानून -


भारतीय संसद द्वारा 52 वे संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा दल-बदल कानून को लागू किया गया। तब किसी दल के चुनाव चिह्न से निर्वाचित एक तिहाई सदस्यों द्वारा दल-बदल को वैध माना गया। फिर 91 वे संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 में सदस्य संख्या को परिवर्तित कर 2 तिहाई कर दिया। उदाहरण के लिए किसी दल के 30 प्रत्याशी किसी विधानसभा चुनाव में निर्वाचित (विजयी घोषित) हुए हैं तो चुनाव बाद दल बदलने के लिए न्यूनतम 20 (कुल निर्वाचित विधायकों का दो तिहाई) नेताओं द्वारा एकसाथ दल बदलना होगा अन्यथा उन्हें विधानसभा सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने के साथ अगले 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाता है। ऐसे में नेता अब चुनाव पूर्व ही दल-बदल कर रहे हैं। इस कानून के नहीं होने के समय नेता चुनाव बाद या अपनी पसंद से किसी को भी बिना दल-बदल किए समर्थन दे सकता था। ऐसे में आप यह भी कह सकते हैं कि दल बदल कानून कांग्रेस समेत छोटे दलों के लिए काल साबित हुआ। इस दल बदल कानून से कई छोटे दल चुनाव पूर्व ही समाप्त हो जाते हैं। पहले इस कानून के अस्तित्व में नहीं होने से कई नेता चुनाव जीतकर बिना दल-बदल समर्थन दे देते थे, वर्तमान में ऐसा संभव नहीं, रहा। 

सत्ता सुख -(स्वार्थ) - 


चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी का एकमात्र उदेश्य होता है वो चुनाव जीते। प्रत्येक. राजनैतिक दल का उदेश्य होता है वो चुनाव बाद अपनी सरकार बनाये। आजकल कांग्रेस का जो प्रदर्शन है, उसमे कांग्रेस के अच्छे जनाधार वाले नेता भी हार जाते हैं, लोग सोचते हैं कि कांग्रेस की सरकार तो बनने वाली है नहीं। इसके भी इतर कांग्रेस विचारधारा विहीन होने से पार्टी के नेताओ और पार्टी के आधिकारिक पदाधिकारियों के सुरों में कोई तालमेल नहीं दिखने से कार्यकर्ता हताश हो जाते हैं और रुष्ट हो मतदान तक नहीं करते। ऐसे में जिन्हें सत्ता सुख चाहिए उन्हें उन प्रदेशों में तो बीजेपी में जाना ही होगा जहां बीजेपी का जनाधार दिनोंदिन मजबूत होता जा रहा है। सत्ता निहित सुख को भूनाने के लिए नेताओं को सत्ता के साथ होना ही पड़ता है, जो आजादी के बाद से चलता आ रहा है। 

बीजेपी विचारधारा के अनुकूल - 


बीजेपी और बीजेपी कि विचारधारा आज के जमाने में कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं के लिए बहुत ज्यादा ही अनुकूल हो गई है। वो कांग्रेस में समय बर्बादी की बजाय बीजेपी की विचारधारा में घुलमिल कर आगे बढ़ना चाहते हैं, वो बीजेपी का रुख कर आगे बढ़ भी रहे हैं। ऐसे नेताओ मे हिमंता बिस्वा शर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति के नेताओ में है। दूसरी ओर कांग्रेस की कोई विचारधारा ही नहीं होने से काँग्रेस नेता किसका समर्थन करे कब क्या स्टैंड ले इसी से झुझते रहते हैं। बीजेपी की स्पष्ट विचारधारा कांग्रेस समेत तमाम छोटे दलों के नेताओं को अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं। 

आरोपों से बचाव -


कांग्रेस पार्टी का जब शासन रहा तब उसने देश और जनता के लिए क्या किया? यह यक्ष प्रश्न है कांग्रेस पार्टी के नेताओ के सामने बरसो बाद भी पहाड़ के रुप में आज भी खड़ा है। अब इसका उत्तर और अधिक जटिल हो गया है क्योंकि उत्तर जानने की इच्छा रखने वाला इसका जबाब देने के लिए वर्तमान सरकार के कार्यो से तुलना कर जबाब सुनना चाहता है। इसका जबाब कांग्रेस के नेता किसी भी क्षेत्र में उसके द्वारा किए गए कार्यो और वर्तमान सरकार द्वारा किए गए कार्यो की तुलना करते हुए दे नहीं सकते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस का रुख क्या है? इसका जबाब भी कांग्रेस पार्टी के किसी भी नेता और प्रवक्ता द्वारा नहीं दिया जा सकता है, लोगों द्वारा पूछे जाने वाले इन्हीं सवालों से बचने के लिए कई नेता कांग्रेस से भाग बीजेपी में रहे हैं। हम विकास के साथ है कहकर पार्टी छोड़ने वालों की सूची बहुत विशाल है। वे सभी विकास के साथी असल में उनके सामने खड़े यक्ष मुद्दों और सवालों से भागे है। विकास और अपने द्वारा किए गए कार्यो पर चुप रहने वाली कांग्रेस चाहती है कि सभी नेता सिर्फ बीजेपी के खिलाफ बोले लेकिन काम की बात आते ही चुप्पी साध ले, जो कई कांग्रेस नेताओ के लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया है। 

स्वयं के जनाधार का सही उपयोग -


स्वयं का जनाधार होने के बावजूद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा जैसे नेता अपने से कम जनाधार वाले नेताओ से चुनाव हार गए। राजनीति में जनाधार के बावजूद आपकी जीत नहीं हो रहीं हैं तो उस जनाधार का क्या अर्थ? कांग्रेस पार्टी के कई नेता अपने जनाधार का सही उपयोग करने के लिए कांग्रेस को छोड़कर वो बीजेपी में जा रहे हैं। यह पार्टी छोड़ने का मुद्दा कांग्रेस से ज्यादा छोटे दलों को अधिक परेशान कर रहा है, उसी के कारण कई छोटे दल तो अपने चुनाव चिह्न तक गँवा चुके हैं। वर्तमान में राजस्थान से काँग्रेस छोड़ बीजेपी में आए महेंद्रजीत सिंह मालवीया के साथ भी लोकसभा चुनाव में यही मुद्दा खड़ा होता रहा है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश की राष्ट्रीय लोक दल बीजेपी के साथ गठबंधन में आई उसका कारण अपना खोया हुआ वजूद बचाना और खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए ना चाहते हुए भी बीजेपी से हाथ मिला, बीजेपी में शामिल हो रहे नेताओ को अपने दल में रोकना है। 

बीजेपी द्वारा कांग्रेस का मनोबल गिराना -


राजनीति है क्या? एक खेल जिसमें एक हारता है तो दूसरा जीतता है, सिर्फ इतना ही नहीं। राजनीति में जो होता है वो सब चुनाव तक सीमित नहीं हैं। कुछ चुनाव के पहले तो कुछ बाद में भी होता है। चुनाव में मामला सीधा होता है लेकिन चुनाव पूर्व सीधा नहीं ।ऐसे में बीजेपी हर बार कांग्रेस को चुनाव के मैदान में उतरने के पहले ही मैदान से बाहर करने के लिए जो दांव-पेच खेल उसे चुनाव पूर्व ही हरा दे, उसमे एक कांग्रेस के नेताओ को अपने साथ मिला उसका मनोबल गिराना भी है, जो साफ देखा गया है, पिछले कई चुनाव में और इसका लाभ भी बीजेपी को मिला है।

कांग्रेस के पास रणनीति का अभाव तो है ही, तभी अपने हर नेता को भ्रष्टाचारी बोल देती है। जब तक वो दूसरी रणनीति में नहीं आ जाएगी तबतक यूँ ही चलेगा। कांग्रेस छोड़ नेता बीजेपी में शामिल होते रहेंगे और कांग्रेस स्वयं ही अपने नेताओ को भ्रष्टाचारी कहती रहेगी।

कब तक चलता रहेगा यह खेल?


कांग्रेस पार्टी को छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओ ने भारतीय इतिहास में चुनाव पूर्व दल बदल के सभी रिकॉर्ड धराशायी कर दिए हैं। हर दिन कई प्रदेशों के पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद, जिला पंचायत, स्वायत शासन प्रणाली के नेता, विधायक और मंत्री कांग्रेस छोड़ बीजेपी में जा रहे हैं। ऐसा शायद ही कोई दिन निकला होगा 2024 में जिस दिन किसी काँग्रेस के नेता ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी में जाने की घोषणा ना की हो। हर दिन नेताओ द्वारा कांग्रेस को छोड़कर बीजेपी में जाने से काँग्रेस के कई नेता पार्टी छोड़ने वाले नेताओ पर ऊल फिजूल ब्यान दे कांग्रेस के लिए और संकट खड़ा कर देते हैं, जो 5-7 जमे जमाए कांग्रेस के नेताओ को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर कर देता है।

जब तक कांग्रेस पार्टी कोई स्पष्ट विचारधारा के साथ मैदान में नहीं आएगी तब तक यूँ ही चलता रहेगा। कांग्रेस कब भ्रम जाल से निकल एक स्पष्ट विचारधारा के साथ आ सकती है, यह पूछने पर कांग्रेस के प्रवक्ता टीवी प्रवक्ता पर ही प्रश्न दाग देते हैं, ऐसे में कोई यह नहीं कह सकता है कि वर्तमान समय के कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व और नीति से निकट भविष्य में कोई बदलाव आ सकता है। लेकिन देश की जनता के साथ कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कांग्रेस में बदलाव और दल बदलने वालों सिलसिला उस दिन रुक सकता है जब बीजेपी कोई गलत निर्णय लेगी। कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व बीजेपी पर टिका हुआ है, बदलाव ही कांग्रेस को बचा सकता है, कांग्रेस खुद, इसके नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस को नहीं बचा सकते हैं। 

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