भारतीय कृषि मानसून का जुआ, भगवान भरोसे खेती। Mansoon

भारत एक कृषि प्रधान देश होते हुए भी भारतीय कृषि की तुलना जुए से की जाती रही हैं। भारत में मानसून का आना निश्चित नहीं है, इसी के कारण मानसून का आगमन किसी त्यौहार से कम नहीं हैं। भारतीय कृषि मानसून पर ही निर्भर है, मानसून ही निर्भर करता है कि खेती कैसी होगी? एक अच्छा मानसून यानी अच्छी खेती।
भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है तो दूसरी ओर कृषि मानसून पर निर्भर है। किसानो के साथ सरकार भी मानसून का उसी उत्सुकता से इंतजार करती हैं जो उत्सुकता एक अभ्यर्थी प्रतियोगिता की करता है। इन्हीं अनिश्चितता के चलते मानसून की तुलना जुए से की जाती है।

मानसून का अर्थ -


मानसून हिन्द महासागर और अरब सागर से भारत के दक्षिण पश्चिम मैदानी भागों में बहने वाली हवाओं को कहा जाता है। ये हवाएं समुद्री तट से मैदानी हिस्से (ठंडे तटों से गर्म मैदानी हिस्से) की ओर बहने से नमी पैदा कर बरसात कराती हैं। इन हवाओं के बहने का एक निश्चित समय (जून से सितंबर) हैं।

मानसून शब्द भारत में सर्वप्रथम उपयोग ब्रिटिश कालखंड में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाली हवा के लिए किए जाने की पुष्टि कई बार हुई है। ये हवाएँ तत्कालीन भारत (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) के दक्षिण पश्चिम में भारी बरसात को लेकर आती थी। मानसून शब्द अंग्रेजी के 'मॉनसून' शब्द से भारत में आया है जो मूल रुप से पुर्तगाली भाषा के 'मॉन्साओ' से लिया गया है। इसका सम्बन्ध डच भाषा के 'मॉनसन' से भी मिलता है। हालांकि अरबी में भी मौसिम और उर्दू हिन्दी भाषा में मौसम शब्द हवाओं के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है।

मानसून का स्वभाव - 


भारत में अधिकांश वर्षा मानसून की हवाओं से होती है, इस कारण इसके स्वभाव पर विस्तृत चर्चा की जानी आवश्यक हैं। जून के महीने से अरब सागर से उठने वाली हवाओं के शुरु होने के साथ भारत के विभिन्न हिस्सों में बरसात शुरु हो जाती हैं। यह हवाएँ प्रतिवर्ष समान रुप से बरसात करने में कारगर नहीं है। कभी समान्य, कभी सामान्य से अधिक तो कभी कम बरसात इन्हीं हवाओं के रुख के कारण होता है। 

मानसून का स्वभाव एक जैसा नहीं है। अति वृष्टि बाढ़ ले आती है तो अल्प वृष्टि अकाल को आमंत्रित करती हैं। मानसून की हवाए पल-पल रुख बदलने में माहिर होती हैं, उसी के कारण इसे मौसम कहा जाता है, इसी के कारण इसे 'मौसम' कहा जाता है। 

भारतीय कृषि - 


भारत की दो तिहाई कृषि असिंचित है तथा मानसून पर निर्भर है। भारत में कृषि की उपज किसान की मेहनत से अधिक मानसून निश्चित करता हैं। मानसून की हवाएँ तय करती है कि बरसात कितनी होगी? इसी बरसात से उपज होती हैं। उदाहरणार्थ अगर किसी बरस बरसात बहुत कम हुई तो किसान की मेहनत का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। कई बार तो किसान बुवाई कर देता है उसके बाद अगली बारिश नहीं होती है तो बुवाई और खेत को तैयार करने की लागत ही जेब से देनी पड़ जाती है। भारत में प्रतिवर्ष बरसात मॉनसून कि स्थिति पर निर्भर करती है। 

मानसून पर निर्भर भारतीय कृषि वर्ष में  केवल एक ही बार होती हैं। सामन्यतः भारत में खरीफ की फसल (जो कृषि पर निर्भर है) की बुवाई जून - जुलाई महीने में होती हैं। इस ऋतु में पूरे चार महिने तक होती है, अगर हवाएं अच्छी रहीं। 

भारतीय कृषि को क्यो कहा जाता है, जुआ? 


भारतीय कृषि का दो तिहाई के लगभग हिस्सा पूरी तरह से मानसून पर निर्भर है। मानसून अनिश्चितता का खेल है, जो कई तथ्यों दबाव ताप, गति और अवरोध पर निर्भर करता है। मानसून का आना निश्चित नहीं होने से किसान के लिए कृषि जोखिम और अनिश्चितता का खेल बन जाता है, इसी के कारण कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है। आज भी भारत में आधी से अधिक कृषि योग्य भूमि असिंचित है। भारत में कृषि और सिंचाई को बढावा देने वाली सभी सुविधाएं किसानो के पास नहीं है, ऐसे में जोखिम भरी कृषि को भारतीय योजना आयोग ने ही मानसून का जुआ करार दे दिया था, भारतीय कृषि को। 

भारत के सभी क्षेत्रो में भूमिगत और नहरी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं होने से अभावग्रस्त क्षेत्रो के किसान मानसून पर निर्भर है। भारत के अभावग्रस्त किसानो के लिए खेती जुए से कम नहीं है। इस जुए से ना सिर्फ कृषि ही प्रभावित होती बल्कि कृषि आधारित कार्य यथा पशुपालन, मछलीपालन और अन्य कार्य भी प्रभावित होते हैं। इनके अतिरिक्त कृषि आधारित उद्योगों का संचालन भी मानसून पर निर्भर है।

मानसून का उत्सव - 


मार्च महीने से भारत के मैदानी हिस्से खासतौर से दक्षिण पश्चिम में भीषण गर्मी रहती है। मौसम विशेषज्ञ मानते हैं कि अधिक गर्मी अच्छे मानसून का संकेत होती हैं। उच्च तापमान ठंडी हवाओ को आकर्षित करने में कामयाब होता है फलस्वरूप अधिक वर्षा होती है। सच कहें तो भीषण गर्मी के दौर के साथ ही मानसून का उत्सव शुरु हो जाता है। दोपहर के समय तपते शरीर और पसीने में भीगे हुए लोग खेतों को कृषि के लिए उपयुक्त बनाने में जुट जाते हैं। लोग खेत में उगी अनावश्यक झाड़ को हटा कृषि के लिए उपयुक्त बनाते हैं और फिर करते हैं इंतजार... पहली मॉनसून की बारिश का। 

जब मानसून की पहली बारिश हो जाती है, तब किसान बैल, ऊंट, ट्रैक्टर और हल लेकर खेतों में पहुंच खेती शुरू कर देते हैं। इन दिनों कई तपते दिनो के बाद मौसम सुहावना हो जाता है, बारिश से। ठण्डी हवाएं चलने लगती है और आसमाँ बादलों से आच्छादित होने से छांव सी होने लगती है, कई बार रुक-रुक कर फुहारें आने लगती है तो वो पेड़ो की शरण लेता है लेकिन बच्चे बारिश में खेलने लगते हैं। महिलाएं खेतों में काम करने लगती है खाद को बिखरने से लेकर मेड़ को मज़बूत करने का। पंछी आसमान में उड़ते तो मोर खेतों में नाचते नजर आने लगते हैं। जलाशयों में साफ पानी भर जाता है और हवा के साथ उड़ने वाली धूल से निजात मिलने लगती है। इन सबके बीच किसानो कि आँखों में उत्साह नजर आता है आने वाली फसल का। 

मानसून का उत्सव बड़ा जोर का होता है। पशुओं के नए बाड़े बनते हैं तो खेतो में बनी झोंपड़ी को फिर साफ किया जाता है। अब किसान घर की बजाय खेत में खाना खाते हैं तो पेड़ों के नीचे दुपहरी में सुस्ताते है। थोड़े दिन बाद खेतों में फसल उग आती है फिर जब बारिश होती है उसके साथ खेतों में हरियाली आच्छादित होने लगती है, उसके दुगनी किसानो के मन में उत्साह और आशा की उमंग दौड़ने लगती है। पशुओं को हरा चारा मिलने लगता है, उन्हें लगने लगता अब दुनिया उन्हीं की है। सावन का महीना यूँ तो प्रेम का महीना कहलाता है जिसमें विरहिणी की विछोह की खूब कहानिया रची है लेकिन इसी महीने में पालतू पशुओं में मिलन रुत आती है। किसान गिनने लगते हैं कितनी बकरियां गाय, भैंस और भेड़ नई हुई है, जो आने वालों दिनों में नए मेहमान लाने वाली है। दूसरी ओर बच्चे इंतजार करने लगते हरी सब्जी के साथ खेतों में पैदा होने वाले फलों का। 

मानसून का उत्सव सच कहें तो प्रकृति का उत्सव है, एक बढ़िया मानसून सभी के चेहरे पर खुशी और उमंग लाता है। लेकिन यह खुशी निरंतर नहीं है। कई बार कमजोर मानसून किसानो के साथ प्रकृति में भी निराशा भर देता है, लेकिन इस पर नियंत्रण किसका जो इसे अपने पाले में कर सके। नियत्रंण का ना होना और अपने पाले में पलटने की शक्ति के ना होने के कारण ही इसे कहा जाता है, जुआ। यह जुआ है जो आशा की उमंग लेकर आएगा या निराशा के भाव यह तो प्रकृति ही जाने। 

मानसून का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव - 


भारतीय कृषि मानसून पर आधारित है और अर्थव्यवस्था कृषि पर। कृषि और अर्थव्यवस्था का संबंध होने के कारण इसका मानसून से गहरा संबंध है। अच्छे मॉनसून के बाद अच्छी उपज आने से किसानो की क्रय शक्ति को बढावा मिलता है तो उद्योगों को कच्चा माल। ऐसे में बाजार में एक तरफ कामगारों की संख्या की मांग बढ़ जाती है तो दूसरी ओर क्रेता द्वारा वस्तु की मांग। इस दौर में रोजगार को बढावा मिलता है तो काम तलाशने वालों को काम। बाजार अधिक संतुलित हो जाता है और राष्ट्रीय सकल उत्पादन को बढावा मिलता है। लेकिन कमजोर मॉनसून की दशा में इसके बिल्कुल उल्टी दशा बाजार की हो जाती है जो असंतुलन की स्थिति को पैदा करती है। 

आज भी भारत की आधी से अधिक आबादी किसी ना किसी रूप से कृषि पर निर्भर है। इतनी संख्या में लोगों का जुड़ाव होने से आप बाजार की दशा और दिशा दोनों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं कि कमजोर मॉनसून के बाद क्या होता है? मॉनसून आज तकनीकी के दौर में भी उत्सव है भारत में, ऐसा उत्सव जो देश को खुशहाली देता है तो लोगों के दिलों को सुकून। खेतों को हरियाली तो बाजारो को रौनक। उद्योगों को कच्चा माल तो बाजार को ग्राहक। कृषि और कृषि आधारित क्रिया धुरी है अर्थव्यवस्था की, जिसके चारो और बाजार का घूर्णन होता है। 

मानसून और महंगाई - 


आदमी की जरूरत रोटी कपड़ा और मकान। व्यक्ति अपनी इन्हीं मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाजार पर निर्भर है। बाजार उद्योगों पर और उद्योग कृषि पर, कृषि मॉनसून पर। भारतीय बाजारों की शुरुआत होती है मॉनसून से। बेहतर मॉनसून ही बाजार में आपकी मूलभूत आवश्यकता की वस्तु उपलब्ध करा सकता है। ऐसे में मॉनसून का बहुत अधिक योगदान है, बाजार को नियंत्रित करने मे। बाजार में काम की वस्तु उपलब्ध होना सिर्फ मालिक और मजदूर की मेहनत पर ही निर्भर नहीं करता है और ना ही उद्योग पर यह निर्भर करता है मॉनसून पर। 

भारत में मॉनसून का आगमन जून महीने में होता है। जून में बरसात अधिक होने से थोड़े दिन के लिए मार्ग अवरूद्ध हो जाने से थोड़ा बाजार में इसका असर महंगाई के रुप में दिखने को मिलता है लेकिन एक महीने के भीतर अच्छे मॉनसून का असर बाजार में महंगाई नियंत्रित होते दिखने लगता है। बाजार में सब्जियां सस्ती होने लगती है, खाने-पीने के वस्तु से अन्य आवश्यकता की वस्तु भी सस्ती होने लगती है लेकिन कमजोर मॉनसून की स्थिति में बाजार पर विपरीत असर होता है। 

निष्कर्ष - 


भारतीय कृषि मॉनसून पर निर्भर है, जिसके कारण इसे मॉनसून का जुआ कहा जाता है। मॉनसून गर्मियों में होने वाले तापमान के साथ अन्य कई बिंदुओं पर निर्भर करता है, जिसके कारण प्रतिवर्ष निश्चित समय पर मानसून का आगमन संभव नहीं है, इसी कारण इसे मानसून का जुआ कहा जाता है। मानसून ठंडे तटों से गर्म मैदानों की ओर चलने वाली हवा है, जिसका ना तो आना निश्चित है और ना ही बरसना इसी के कारण यह किसानो के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं हैं।

अन्य प्रश्न -


प्रश्न: भारतीय कृषि 'मानसून का जुआ है', यह कथन किसका हैं?

उत्तर: भारतीय योजना आयोग का।

प्रश्न: मानसून शब्द का भारत में सर्वप्रथम प्रयोग कब हुआ?

उत्तर: ब्रिटिश काल में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से होने वाली बरसात के लिए सर्वप्रथम मानसून शब्द का प्रयोग किया गया।

प्रश्न: मानसून का जुआ किसे कहा जाता है?

उत्तर: भारतीय कृषि को।

प्रश्न: भारत में मानसून का आगमन कब होता है?

उत्तर: जून महीने में।

प्रश्न: मानसून में बुवाई किस फसल की होती है?

उत्तर: खरीफ की फसल। 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ