By - मरुवाणी-राजस्थान
आपने आपातकाल के बारे में खूब सुना होगा। इंदिरा गाँधी द्वारा थोपे गए आपातकाल को भारत का काला इतिहास कहा जाता है। काला इतिहास शब्द सुनकर आपके और हमारे मन में कई प्रश्न उठते हैं। आखिर इसे किस कारण से काले इतिहास के रूप में जाना जाता है?
वर्ष 1975 की 25 और 26 जून के बीच की रात इंदिरा गांधी ने देश के इतिहास में आपातकाल यानी इमरजेंसी का काला अध्याय लिख डाला। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन के हस्ताक्षर के साथ इस काले अध्याय की शुरुआत हुई। 25 और 26 जून की रात के बीच (मध्यरात्रि) इंदिरा गांधी की आवाज ऑल इंडिया रेडियो पर गूंजी और भारत में आपातकाल लगाए जाने की घोषणा हुई। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक चला।
आखिर क्यों लगाया आपातकाल -
वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी रायबरेली से सांसद चुनी गईं। इंदिरा गांधी के खिलाफ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की। राज नारायण जी इंदिरा गांधी के खिलाफ 6 प्रकार के आरोप लगाए यह आरोप इस प्रकार थे-
पहला आरोप- इंदिरा गांधी ने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारी और अपने निजी सचिव यशपाल कपूर को अपना इलेक्शन एजेंट बनाया और यशपाल कपूर का इस्तीफा राष्ट्रपति ने मंजूर नहीं किया।
दूसरा आरोप- कि रायबरेली से चुनाव लड़ने के लिए इंदिरा गांधी ने ही स्वामी अद्वैतानंद को बतौर रिश्वत 50,000 रुपए दिए, ताकि राजनारायण के वोट कट सकें।
तीसरा आरोप- इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार के लिए वायुसेना के विमानों का दुरुपयोग किया।
चौथा आरोप- इलाहाबाद के डीएम और एसपी की मदद चुनाव जीतने के लिए ली गई।
पांचवां आरोप- मतदाताओं को लुभाने के लिए इंदिरा गांधी की ओर से मतदाताओं को शराब और कंबल बांटे गए।
छठा आरोप- इंदिरा गांधी ने चुनाव में निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च किया।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों का पक्ष सुनने के बाद इस चुनाव में इंदिरा गांधी को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का उत्तरदायी मानकर चुनाव निरस्त कर विरोधी को विजयी घोषित कर दिया गया। साथ ही कोर्ट ने इंदिरा को 6 वर्ष चुनाव नहीं लड़ने के आदेश दिए। कोर्ट के फैसले से इंडिरा को अपनी कुर्सी डगमगाती लगी, जिस कारण देश को यह काला कानून देखना पड़ा। ताकि इंदिरा पुनः चुनाव लड़ सके तब तक देश पर आपातकाल थोप दिया और देश की दशा और दिशा की बागडोर राष्ट्रपति के माध्यम से ही इंदिरा ने अनैतिक तौर से सम्भाल कर रखी।
क्यो कहते हैं काला इतिहास -
हमारी संस्कृति में काले शब्द का अर्थ बहुत ही घिनौने तरीके से निकाला जाता है। किसी महिला द्वारा काले रंग का वेश धारण करना यानी उसका विधवा होना है और दुखमयी जीवन व्यतित करने से हैं। इसी प्रकार किसी राजनेता को काले ध्वज दिखाना मतलब उसके आतंक से क्षेत्र विशेष की जनता का दुखी होना। इसी कारण किसी शब्द के साथ काला शब्द जोड़ देने मात्र से उस शब्द का अर्थ डरावना और कुटिल प्रतीत होने लगता है। कुल मिलाकर काले शब्द से अर्थ दुखदायी जीवन से हैं। ऐसा दुख भरा जीवन आतंक से होने का प्रतीक होता है काला जीवन। इतिहास में देखे तो काले पानी की सजा का नाम सुनकर ही रूह कांप जाती है।
काला शब्द के प्रयोग से अर्थ बिगड़ जाना -
ऐसे कुछ शब्द, जिनके पहले काला शब्द जोड़ दिया जाने से उनका अर्थ एकदम से बदल बहुत ही डरावना और कुटिल हो जाता है के कुछ उदाहरण - काला चोर, काला नाग, काला बाजारी और काला दिल। इन शब्दोंमें मात्र काला जोड़ देने से सबके अर्थ शब्द से अधिक डरावने और कुटिल हो गए हैं। इन सबका अर्थ दुखदायी और कुख्यात होता है। काला चोर यानी कि बहुत ही भयंकर और डरावना कपटी चोर। इसी प्रकार काले नाग का अर्थ सबसे जहरीले सांप से लिया गया है। कालाबाजारी बाजार का सबसे बिगड़ा हुआ स्वरूप तो काला दिल बेकार दिल के व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। ऐसा ही हमारी इतिहास के काले पन्ने होने का कारण है।
आपातकाल के दिन भी लोगों के लिए ऐसे ही डरावने और दुख भरे दिन थे। इतिहास के काले दिनों में यानी आपातकाल के समय तत्कालीन सरकार द्वारा जनता के सभी नागरिक अधिकार छीन लिए गए थे और जनता को पुलिस के जुल्मों का शिकार होना पड़ा। आम आदमी पर जुल्मों की इन्तेहा हो गई। उन दिनों मे महज आपातकाल की चर्चा से ही जेल की हवा खानी पड़ती थी। आदमी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात करने से बचता था, उसके मन में डर पैदा हो गया उसके ऐसा करने मात्र से जेल की हवा खानी पड़ सकती है।
उस समय आम नागरिकों के साथ पत्रकारों और साहित्यकारों पर भी जुल्म ढहाए गए। पत्रकारों और साहित्यकारों को प्रताड़ित किया गया। उन्हें जेल में ठूंस दिया गया, जिन पत्रकारों ने और साहित्यकारों ने इंदिरा के इस घोर अमानवीय कृत्य का विरोध किया। इतना कुछ होने के बावजूद भी पत्रकार इंदिरा के इस कदम की आलोचना करने में नहीं चुके। उन्होंने उस समय भी समाज के हितों को ध्यान में रख आलोचना करने का प्रयास किया। समाज में इंदिरा की आलोचना हुई तो आलोचकों और दूसरी पार्टी के नेताओ को जेलों में भर जनता की आवाज को पूरी तरह से दबाने का प्रयास किया गया। इस कारण अखबारों में खाली और काले पन्ने छा गए जिस कारण इस इतिहास को काले पन्ना का इतिहास भी कहा जाता है।
जनसत्ता अखबार का आपातकाल की घोषणा की खबर के दिन खाली पड़ा संपादकीय पेज। अखबार द्वारा इस प्रकार का विरोध किए जाने कारण इस अखबार के सम्पादक को जेल भेज दिया।
पहले दिन से ही ऐसा विरोध सहने के कारण उस दौर में पत्रकारों और साहित्यकारों पर कई तरह के प्रतिबन्ध थे तो कुछ लोगों ने भूमिगत होकर अपनी कलम को चलायमान रखा। पत्रकारों ने अपने हौसले नहीं हारे। वो लिखते रहे और जेल जाते रहे, इस काले कानून की समाप्ति के बाद इन्होंने उस समय के लिखे शब्दों को किताबों में पिरोया, उसी से हमे इस कानून की वीभत्स पक्ष और जनता पर हुई बर्बरता पूर्ण कार्यवाहियों यथा नसबंदी से गरीबों के घर ढहाने का पता चलता है।
ऐसे अमानवीय कृत्यों और लोकतंत्र के हनन के समय को तत्कालीन जन नेता जयनारायण प्रकाश में इस काल को "काला काल" कहा इसी के कारण इसे काले इतिहास के रूप में याद किया जाता है। जिस दिन यह कानून लागू हुआ, उसे आजाद भारत के इतिहास का काला दिन कहा जाता है।

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