वामपंथ कि राह पर जाट युवा

वैसे भारत में जाट जाति को किसानों कि अग्रणी जाति के रुप मे जाना जाता रहा हैं। सदियों से जाटों की पहचान अन्नदाता के रुप में कि जाती रही हैं। बदलते युग के साथ जाट जाति ने खेती किसानी में आमूलचूल परिवर्तन अंकित कर भारत कि बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने का काम किया है। 

 

अगर भारतीय इतिहास पर नजर डाली जाए तो जाटो ने खेती किसानी के साथ युद्ध के मैदानों में भी आवश्यकता पड़ने पर अपना पराक्रम और शौर्य दिखाकर अपना नाम बलिदानों कि सूची में दर्ज कराया है। राजस्थान राज्य के वर्तमान भरतपुर जिले में स्थित लोहागढ दुर्ग जिसे जाट शासकों ने बनाया था। यह दुर्ग साक्षी है कि किस प्रकार युद्ध से जाट जाति साम्राज्य स्थापित कर एक मजबूत नेतृत्वकर्ता जाति के रुप में उभरी। नेतृत्व के साथ ही सम्पूर्ण बृज भूमि के लोगों के हृदय में मजबूत पैठ जमाई। आज भी उनकी विरासत और लोहागढ इस विरासत के साक्षी है। 

भारत देश कि आजादी के बाद भी जाट जाति मुख्यतः अपने परंपरागत व्यवसाय खेती से जुड़ी रही। यही कारण है कि जाटों को आज भी अन्नदाता के रुप में पहचान है। आजादी के बाद देश में बदलती परिस्थितियों और बदलते परिवेश के साथ जाटो ने कदम मिलाकर देश कि उन्नती में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। जाट जाति के लोगों ने राजनीति, खेल, सरकारी सेवाओं के साथ सेना में भी भाग्य आजमाया। देश कि राजनीति से सेना तक में देश के सर्वोच्च पदो पर अपनी शोभा बढ़ाई और देश कि उन्नती के लिए मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे कुछ उदाहरण देखे तो चौधरी चरण सिंह ने भारतीय राजनीति के सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री के रुप में सेवाएं देकर समाज कि शोभा बढ़ाने के अतिरिक्त किसान कमेरो के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। दूसरी तरफ जनरल दलबीर सिंह सुहाग ने सेना के सर्वोच्च पद पर अपनी सेवाएं दी। 

जाट समाज कि उत्पत्ति और परंपराएं - 


जाट जाति कि उत्पत्ति को लेकर कई प्रकार की किवदंतियां है। स्थापित किवदंती के अनुसार जाटों कि उत्पत्ति देवों के देव महादेव कि जटा से हुई है। देव संहिता के श्लोक 12-17 में भगवान शंकर और पार्वती के वार्तालाप संबंधी श्लोकों में इसका वर्णन है। शिव कि जटा से उत्पत्ति के कारण इनका नाम जट्ट पड़ा। तो कहीं हमे इस बात का भी वर्णन मिलता है कि जाट जाति का संबंध धर्मराज युधिष्ठिर से है। धर्मराज युधिष्ठिर ज्येष्ठ पाण्डु थे, इसलिए उनके वंशज ज्येष्ठ अपभ्रंश होकर जाट कहलाये। 

भगवान शिव से जाट जाति का अटूट सम्बन्ध रहा है। धन्ना जाट शिव के परम भक्त हुए। जाट समाज शुरु से ही पूजा पद्धति और वैदिक धर्म में विश्वास करता आया है। वही करमा जाटनी भगवान कृष्ण कि भक्तिनी हुई और उन्होंने भगवान को खिचड़ी भी खिला दी। ऐसे में स्पष्ट है कि जाट समाज शुरु से ही महादेव कृष्ण कि पूजा करता आया है तो अभिवादन के लिए राम-राम शब्द उपयोग किए जाने से स्पष्ट है कि भगवान राम कि भी पूजा करते रहे हैं। तेजाजी, गोगा जी और रामदेव जी के साथ अन्य कई लोक देवताओ के देवले घरों के बाहर खेतों में होते थे, जिससे स्पष्ट है कि जाट समाज मूर्ति पूजक भी रहा है। 

वामपंथ का अर्थ - 

जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स के के विचारो का समर्थन करने वाली राजनीतिक विचारधारा जो विद्यमान विचारधारा के स्थान पर समाजवाद कि पेरोकार रही। यह परंपरागत विचारधारा कि बजाय प्रगतिशील और समाजवादी विचारधारा का समर्थन करती है। वामपंथ विचारक मानते हैं कि वामपंथ विद्यमान व्यवस्था को समाप्त कर ऐसी व्यवस्था प्रदान कर सकता है, जिसमें सबको समान अधिकारों कि प्राप्ति संभव होगी। दबे कुचले तबकों को समानता का अधिकार प्रदान करेगी। 

हालांकि कार्ल मार्क्स कि इस विचारधारा का नाम बैठक व्यवस्था से आया था। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान एस्टेट जनरल मे विधायकों कि बैठक से हुआ, इस दौरान क्रांति के समर्थक विधायक बांयी ओर बैठते थे। बांयीं और बैठने से ही वाम) left) कहलाये और इनकी विचारधारा वामपंथ (leftist) कहलाई। वर्तमान में भारत में भी वामपंथ का समर्थन करने वाले कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी दो दल है, जो कई राज्यों में सत्ता में भी रहे, वर्तमान में केरल में इन्हीं दलों कि सरकार है। 


ऐसे में आप समझ ही गए होंगे की वामपंथ का उद्भव क्रांति के समर्थन से हुआ। ऐसे में इनके खून में एक ही बात है क्रांति से सत्ता कि प्राप्ति। वर्तमान में, इनके पास एक ही लक्ष्य है सत्ता कि प्राप्ति के लिए क्रांति और विद्यमान व्यवस्था को ध्वस्त करना। विद्यमान व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए वामपंथ विचारधारा का समर्थन करने वालों के पास लाखो तर्क है। वामपंथ के विचारक तर्क देते हैं कि वर्तमान व्यवस्था रुढ़िवादी है जो उन्नती में बाधक है ऐसे में ऐसी व्यवस्था कि आवश्यकता है जो समानता का भाव पैदा कर सके। 

भारत में वामपंथ कि वर्तमान स्थिति - 

वर्तमान में वामपंथ अपनी मूल विचारधारा को छोड़कर आक्रामक विचारधारा के पक्षधर के रूप में खड़ा नजर आ रहा है। दुनिया के साथ भारत में भी अस्तित्व खोते वामपंथ के पास संरक्षित करने के लिए कुछ बचा नहीं होने के कारण ही यह आज आक्रामक स्थिति में पहुंच गया है। दुनिया के कई देशों में सैकड़ों वर्षों के शासन के बावजूद इसके हिस्से में खून के धब्बों, तानाशाही और गैर-जिम्मेदाराना सरकार के सिवाय कुछ नहीं है। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए वर्तमान में इन्होंने आक्रामक रवैया अपना लिया है, जो रवैय्या फ्रांसीसी क्रांति के दौरान था। वर्षों के शासन के बाद इतिहास में कुछ सुनहरा हिस्सा ना होना यह प्रदर्शित करता है इनके भाव गैर-जिम्मेदाराना अत्यधिक रहे, जिसके चलते उनके हिस्से में महज एक क्रांति ही आई जो सत्ता प्राप्ति तक पहुंचाने में सहायक रही। 

आज का वामपंथ अपना गैर-जिम्मेदाराना भाव भूलकर समाज और सत्ता से लाखो सवाल तो कर सकता है लेकिन समाधान के नाम पर कल कि तरह आज भी इनके पास क्रांति के सिवा कुछ धरातल पर उतारने योग्य है नहीं। आज का वामपंथ कि विचारधारा के समर्थक पूंजीवाद पर लाखो प्रश्न तो उठा सकता है, लेकिन समाधान और समानता पैदा करना इनके वश का नहीं है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जहां इनकी सत्ता रहीं वहाँ क्या हुआ? कुछ हुआ? कुछ भी नहीं। कभी अपनी प्रतिज्ञा से बद्ध होकर ना कुछ समाधान के प्रयत्न किए और ना ही समानता के लिए कोई स्कीम को धरातल पर उतारा। जहाँ सत्ता में रहे वहाँ अपनी राजधर्म कि जिम्मेदारी को भूलकर समाज से ही सवाल करते रहे। यूँ जिम्मेदारी से भाग कतरा कर सवाल करने से समाधान नहीं हो सकता, यह बात वामपंथी भी जानते हैं लेकिन वो उत्तर देने की बजाय इस पर भी गैर-जिम्मेदाराना सवाल ही दाग सकते हैं। 

अपनी विचाराधारा और जिम्मेदारी से भागता वामपंथ अपना अस्तित्व खो चुका है। अस्तित्व खोते वामपंथ के पास वर्तमान में जाति-धर्म के साथ बर्षों से चली आ रही परंपराओं पर ही कुछ सवाल शेष बचे है। कई बार वामपंथी विचारक जाति-धर्म के नाम पर समाज को उकसाने के लिए दूसरे धर्म और पंत कि परंपरा को सामने रखता है तो कभी विशेष पंथ और धर्म की परंपरा कि लाख अच्छाई पर एक बुराई ढूंढ ही लेता है। परम्परा और जाति-धर्म पर सवाल करने से वामपंथ का कोई नुकसान नहीं है, क्योंकि वामपंथ का मूल उदेश्य समाज को अपनी परम्परा से तोड़ना है इसी में उनका फायदा है। समाज को अपनी परम्परा से तोड़ने के लिए जितनी आक्रामकता से सवाल किए जाएंगे, उतनी ही तेजी से वामपंथ कि उन्नति होगी यह वामपंथ के विचारक भी जानते हैं। 

वामपंथ और जाट युवा - 

आज के जाट युवाओं को देखे तो वो पूरी तरह से वामपंथ कि राह पर नजर आ रहे हैं, समाज में समरूपता कि स्थापना कि ढाल ओढ़े यह युवा अपनी परम्परा को भूल कर जाट समाज को अन्य समाज और जातियों से ठीक उसी तरीके से तोड़कर अलग कर रहे हैं जिस तरीके से वामपंथ ने स्वर्ण और दलित समाज में खाई पैदा कर दोनों में दूरीयां पैदा की। यह युवा भी अनर्गल सवालों के साथ क्रांति का भाव दिलों में भरकर समाज को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अगर जाट युवाओं के क्रांति के भाव और आक्रामक रवैये पर गौर करे तो इनकी विचारधारा इस प्रकार से वामपंथ विचारधारा से मिलती हुई नजर आ रही है। 

आज भी जाट समाज 

  • समाज में सामंज्य पैदा करने के नाम पर आक्रमकता के साथ ऊटपटांग प्रश्न। 
  • जाट समाज को अन्य समाजों से अलग कर ठीक उसी तरीके से तोड़ना, जिस तरीके का उपयोग वामपंथी विचारकों ने स्वर्ण और दलित समाज को अलग करने में की। 
  • अपने ही समाज में स्थापित विद्यमान परंपरा पर सवालिया निशान लगाना और दूसरे समाज के उदाहरण प्रस्तुत करना। 
  • समाज में किसी समस्या कि उत्पत्ति पर उसके समाधान के कारक और निदान के उपाय खोज निकालने कि बजाय अपने समाज और समाज कि विद्यमान परंपराओं को कोसना। 
  • बिना मतलब के गैर-जिम्मेदाराना प्रश्न करना, जिनका कोई उत्तर नहीं होता। 
  • क्रांति और उनकी अदृश्य व्यवस्था, जिसका वो प्रचार करते हैं पर प्रश्न करने पर उनके पास कोई सटीक उत्तर का नहीं होना। 
  • जाति-धर्म के नाम पर फिजूल के प्रश्न कर वामपंथी विचारधारा को मजबूती प्रदान करना। 
आज भी जाट समाज का अधिकांश हिस्सा अपनी सामाजिक और प्रचलित परंपराओं का पालन करता है। सभी समाज और जातियों से मेल-जोल और समानता का भाव अपने सरल हृदय में रखता है। समाज का बड़ा हिस्सा इस तकनीकी के दौर में अपने परंपरागत कृषि कार्यो से जुड़ा हुआ है और निरंतर उन्नत कृषि कि विधियों का प्रयोग और आविष्कार कर रहा है। अपनी परम्परा से जुड़े हुए इस समाज के एक बड़े हिस्से के पास प्रश्नों की तो कमी है, किंतु देश में खाद्यान्न संकट कि उत्पत्ति का उत्तर अपनी फसल और खाद्यान्नों कि पैदावार जरूर हैं। 

जो युवा वामपंथ के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, एक समय और उम्र के बाद पुनः अपने परिवेश और संस्कृति में लौट आएंगे ऐसी समाज अपेक्षा करता है। समाज के अपने स्वयं के सिद्धांत है, और सिद्धांतों से समझौता किसी भी शर्त पर नहीं कर सकता। 

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