गुंदा अथवा लसोड़ा का पेड़, फल और उसके गुण। Gunda ki Sabji

गुंदा एक फल (कच्चे फल का अचार और सब्ज़ी के रुप में उपयोग) है, जो गुंदी के वृक्ष पर लगता है। इसे बहुवार, लसोड़ा, गोंदबेरी, डेला और लेसवा के नाम से भी जाना जाता है। इसके फल के गुदा में लिपलिपा, गोंद जैसा लसदार प्रदार्थ पाया जाता है, इसी कारण इसका नाम गुंदा अथवा लसोड़ा पड़ा। इसे 'रेगिस्तान की चेरी' कहा जाता है। 


वैज्ञानिक वर्गीकरण - 

तथ्य  स्पष्टीकरण 
जगत  पादप (plant) 
कुल  बोरेजिनेसी (Boraginaceae) 
वंश  काॅर्डिया (Cordia) 
वैज्ञानिक नाम  काॅर्डिया मिक्सा (Cordia Myxa) 

गुंदा का पेड़ -


गुंदा शुष्क, अर्द्धशुष्क जलवायु का का पेड़ है। इसी कारण राजस्थान, गुजरात और पंजाब में गुंदे के पेड़ बहुतायत में देखने को मिलते हैं। पेड़ कि ऊंचाई सामन्यतः 8-10 मीटर की होती हैं, आकार भी पीपल के समान ही होता है। इसकी पत्तियाँ पिपल के पत्तों के जितनी ही बड़ी, किन्तु आकार भिन्न होता है। इसकी पत्तियाँ पर्णपत्ती अंडाकार आगे से नुकीली, चिकनी और पान के स्वाद की होती है। जिसे पान बनाने के लिए विकल्प के तौर पर उपयोग किया जा सकता है। बड़े आकार का पेड़ होने के कारण इसकी लकड़ी काफी मजबूत होती है, जिसका उपयोग फर्निचर बनाने के लिए किया जाता है। इसका आधा कच्चा फल हरा गोलाकार (शुरुआत में शंकु) 20-25 ग्राम का होता है, पकने पर पीला हो जाता है। 

राजस्थान के वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए इसकी उन्नत किस्मों को तैयार किया गया है, जो अधिक उत्पादन देने के साथ राजस्थान के मौसम के अनुकूल है। जो निम्न है - 
  • थार बोल्ट - इस किस्म का विकास केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा की गई। इस किस्म के पूर्ण विकसित पौधे द्वारा गुंदी के फल 1.5 - 2 क्विंटल प्रतिवर्ष प्राप्त होते हैं। यह किस्म के विकसीत पेड़ बिना जल के भी बड़े गुच्छे कि खाने और प्रसंस्करण के योग्य उतम किस्म की गुंदी के फल देती है। 
  • मरु समृद्धि - इस किस्म का विकास केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केंद्र (काजरी), जोधपुर द्वारा किया गया। यह थार बोल्ट के मुकाबले में कम 85 किलो ग्राम प्रतिवर्ष गुंदी नियमित देती है। इसमें फरवरी-मार्च में पुष्प आते हैं और अप्रैल-मई में फल खाने और प्रसंस्करण के योग्य हो जाते हैं। 
इनके अलावा भी पुष्कर, कर्ण गोंदा आदि उन्नत मात्रा में फल देने वाली किस्म है, जिन्हें कुछ मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। 

गुंदा की सब्जी बनाने का तरीका - 


अगर आप गुंदा की सब्जी बनाना चाहते हैं तो इसे आप घर पर आसानी से बना सकते हैं। इसके लिए आप बाजार से या पेड़ दे आधे कच्चे फल ले आए। इन फलों से डंठल को बिना हटाए किसी बर्तन में रखकर पानी में उबाल लीजिए। इन्हें करीब 10 मिनट पानी में उबाले या तब तक उबालें जब तक हाथ से हल्के से दबाने पर टूटकर बीज बाहर ना निकले। यह उबालने का काम बीज को फ़ल से अलग करने के लिए किया जाता है, इसलिए ध्यान रखे, क्रेक होने की अवस्था में आते ही इसे स्टोव से नीचे रखकर ढक्कन लगा दे। 

पानी को ठंडा होने दे (अगर जल्दी है तो गर्म पानी निकाल कर ठंडा पानी डाल दीजिए), नहीं तो हाथ जल जाएंगे। पानी से निकालकर इनके डंठल और टोपी को हटा दीजिए। इसके बाद इन्हें काटकर या हाथ से दबाकर गुठली को निकाल दीजिए। यह प्रक्रिया इसे सब्जी के लिए तैयार करने के लिए मात्र है। अगर आप यह प्रक्रिया नहीं करेंगे तो सब्जी भी नहीं बनेगी इसलिए बीज निकालने के लिए इस विधि का उपयोग कीजिये ताकि बीज आसानी से निकाले जा सके। बीज निकालने के बाद की प्रक्रिया से पहले निम्न सामग्री तैयार कर लीजिए - 

सामग्री
(प्रति 250 ग्राम गुंदा) 
मात्रा 
तेल  4-5 टेबल स्पून 
हल्दी पाउडर  आधा छोटा चम्मच 
जीरा  आधा छोटा चम्मच
धनिया  1 छोटी चम्मच 
मिर्ची पाउडर  1 छोटी चम्मच 
अमचूर  पाउडर  आधा छोटा चम्मच
हींग  थोड़ी सी (आधी) 
सौंफ  1 चम्मच 
अजवाइन  आधा छोटा चम्मच
नमक  स्वादानुसार 
मैथी  स्वादानुसार 


अब आप कड़ाई मे तेल डालकर इसे गर्म कीजिए। गर्म इसमे कुछ मसाले डालकर (जैसा आप अन्य सब्जी बनाते समय डालते हैं) तड़का लगाने के बाद गुंदे (जो आपने बीज निकालकर तैयार किए हैं) तेल में डालकर अन्य मसले भी डाल दीजिए और इसे चम्मच से हिलाकर अच्छी तरह 5-7 मिनट तक पकाए। जब इनमे चिपचिप होना बंद हो जाए तो कड़ाई को स्टोव से उतार दीजिए। अब यह खाने के लिए तैयार है।

ध्यान दीजिये गुंदा में भिंडी की तरह चिपचिप (लिपलिपा) होती है। इसलिए आप इसे बिल्कुल भिंडी कि तरह अपने तरीके से बनाएँ। 

आप इसे बेहतर बनाने के लिए इसके साथ कैरी डाल सकते हैं। राजस्थान में कैरी - गुंदा की सब्जी बहुत लोकप्रिय है। आप कैरी के अतिरिक्त इसमे मैथी डालकर यानी गुंदा - मैथी की सब्जी बनाई जाती है। कैरी और मैथी के साथ इसका अचार भी डाला जाता है। 

कब और कहाँ मिलती है गुंदा? 


सामन्यतः गुंदे के पेड़ पर पुष्प फरवरी-मार्च के महीने में लगते हैं और फल अप्रैल-मई के महीने में लगते हैं। इस कारण बाजार में गुंदा अप्रैल-मई के महीने में मिलता है। सब्जी की दुकानों पर गुंदा मिलता है, सब्जी बनाने और अचार डालने के लिए। अगर आपको गुंदा का आचार लेना है तो अचार वालों के पास ही मिल सकता है। 

राजस्थान और अन्य प्रदेशों में जहां गुंदी होती है वहाँ इस समय होने वाली शादियों में गुंदा-कैरी की सब्जी आमतौर से बनती है। आजकल कई चीजे ऑनलाइन उपलब्ध होने के कारण आपको गुंदा का अचार ऑनलाइन वेबसाइट पर आसानी से मिल सकता है। 

गुंदी का फायदा - 


य़ह फल कार्बोहाइड्रेट का उत्तम स्त्रोत है। इसमें प्रोटीन, रेशा, कैल्शियम, कार्बोहाइड्रेट, फाॅस्फोरस, आयरन, वसा, अम्ल और पेक्टिन आदि पाए जाते हैं। इसके साथ ही इसमे आयुर्वेद के कई गुण मौजूद होते हैं, जिसके कारण इसकी सब्जी को खाया जाता है। राजस्थान की प्रसिद्ध सब्जी पंचकुटा में भी इसका प्रयोग होता है। इसे खाने से निम्न फायदे होते हैं - 

  • हाई ब्लड प्रेशर को कम करना - नियमित सेवन से राहत मिलने के साथ समस्या का पूर्ण निदान भी सम्भव। 
  • लिवर दुरुस्त करना - अगर लिवर में कोई दिक्कत है तो इसके सेवन से दुरुस्त हो सकता है।
  • अस्थमा - इसके फल का सेवन करने से श्वसन संबन्धी विकार नष्ट होते हैं, जिससे अस्थमा के रोगियों को काफी लाभ होते हैं। इसका चूर्ण बनाकर लोग इसी कारण खाते हैं। 
  • शरीर को मजबूत बनाना - इसमे रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है जिसके कारण शरीर को मजबूती प्रदान करता है। 
  • कब्ज - इसका फल का सेवन पाचन तंत्र को मजबूत कर कब्ज से राहत देता है।
  • सफेद बाल - फल के रस को बालो में लगाने से बाल काले हो जाते हैं। 
  • मासिक धर्म का दर्द - महिलाओ में होने वाला फल सेवन से कम होता है, साथ ही छाल का लेप करने से शरीर का दर्द भी कम हो जाता है। 
  • खांसी - फल को उबालकर पानी पीए, फल का सेवन करे या फिर छाल का काढ़ा पीए जिससे गले कि खरांश ठीक हो जाएगी। 
  • दर्द - घुटने या शरीर के दर्द में फल का सेवन करने के साथ छाल और पत्तों का लेप बनाकर दर्द वाली जगह पर लगाने से राहत मिलती हैं। 
  • दांत दर्द - छाल को उबालकर उस पानी से कुल्ला करने और छाल के लेप को दांत पर लगाने दांत और मसूड़ों के दर्द से राहत मिलती है। 
  • खाज खुजली - इसके सेवन करने से राहत मिलती है, साथ ही इसके बीज को पीसकर लेप बनाकर लगाने से दाद जड़ से मिट सकती हैं। 
  • अन्य लाभ - यह फल गर्मी से राहत देकर शरीर में ठंडक पैदा करता है, जिससे गर्मी में होने वाली किल-मुहांसे समाप्त होती हैं। 
गांव के लोग वर्तमान युग में भी छोटी-मोटी बीमारी से बचने और बीमारी के निदान के लिए देशी ईलाज का सहारा लेते हैं। कई लोग समझते हैं कि यह गलत है, किंतु उन्हें देशी ईलाज की सलाह देने वालों की इस बात की जानकारी होती है कि इस व्यक्ति के शरीर में किस चीज की कमी हो गई है तथा किस चीज को खाने से य़ह कमी दूर हो सकती है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा आजकल पेशेवर आहार नियंत्रक लोगों को डाइट से सम्बन्धित जानकारी देकर उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत बनाये रखने में अपनी भूमिका को निभाते हैं। ये सभी जानकारी ऐसे लोग याद रखते हैं और दूसरे लोगों को सलाह दिया करते थे, किन्तु आजकल यह काम आहार विशेषज्ञों ने सम्भाल लिया है वही इस प्रकार कि जानकारी को संग्रहित करते हैं और विभिन्न संचार के माध्यमों से जानकारी देते रहते हैं। 

अस्वीकरण - अधिकांश लाभ आयु और आपकी शरीर की क्षमता पर निर्भर है, इसलिए उपयोग राहत के अनुसार किया जाएं। 

किसान और गुंदी के पेड़ - 


गुंदी के पेड़ लगाकर किसान दोहरा फायदा उठा सकते हैं। एक तरफ वो मेड़ पर गुंदी के पौधे लगाकर मिट्टी के कटाव को रोक सकते हैं तो दूसरी तरफ़ इसके फलों को बाजार में बेच कर नकद भी कमा सकते हैं। इसके फल बाजार में अप्रैल महीने की शुरुआत में अच्छे दाम में बेचे जाते हैं, मई तक दाम गिरने लगते हैं। जल्दी पुष्प और फल आये इसके लिए नवंबर महीने में इसके पत्तों को तोड़ लेते हैं। 
गुंदा अथवा लसोड़ा का पेड़, फल और उसके गुण। Gunda ki Sabji


किसानों के लिए गुंदी के पेड़ किसी वरदान से कम नहीं है। काजरी, जोधपुर और बागवानी संस्थान बीकानेर द्वारा विकसित की गई कई किस्म बिना जल के ही बेहतर उपज देती है तो कुछ बहुत कम सिंचाई से। दूसरी ओर इस प्रकार के पेड़ मृदा के कटाव को रोकने के लिए लगाए जाते हैं, किन्तु जब ये फल देने लगते हैं तो फलों को बेचकर नकद भी कमाया जा सकता है। ऐसे में उनके लिए आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत को चरितार्थ करती हैं। इसके पत्तों कि तुड़ाई कर खाद में भी बदला जा सकता है। पेड़ को काटकर या सूखने पर इसकी लकड़ी का फर्निचर भी बनाया जा सकता है।

गुंदा पकते है तब बच्चों के गर्मियों की छुट्टियां होती है। पक्के हुए गुंदे मरुस्थल के बेर और अंगूर से कम नहीं है। इनके पेड़ तो अंगूर की बेल या बेर की झाड़ से बच्चों के लिए लाख गुना बेहतर है। गुंदा का पेड़ अत्यंत घना होता है, इसकी जबरदस्त छाया होती हैं। गर्मी के मौसम में मरुस्थल में यह किसी पीपल या बरगद के पेड़ से कम नहीं होता है। इसकी घनी छाया में बच्चे खेलते रहते हैं, जब थककर आराम करते हैं तो पक्के हुए गुंदों को तोड़कर खाते हैं और जो नन्हें बच्चे घर पर होते हैं, उनके लिए भी ले जाते हैं। 

पक्के हुए गुंदों से लदे हुए पेड़ पर दिनभर पक्षियों का कलरव गूंजता रहता है। पक्षी एक तरफ तो रेगिस्तान के तपते हुए दिन और लू के थपेड़ों के बीच इसकी घनी छांव को देखकर आकर्षित होते हैं तो दूसरा पक्के हुए गुंदें उन्हें इस घनी छांव में आहार के रुप में मिल जाते हैं। उनके लिए यह किसी वरदान के रूप में है। किसान जब खेत में गुंदे के पेड़ लगाता है तो ना सिर्फ उन्हें आर्थिक लाभ ही होता है बल्कि प्रकृति को सहेजने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को निभाता है, उसने तो अपने घर को संबल देने के लिए यह पेड़ लगाया किन्तु कई पक्षियों के लिए तो यह घर ही बन जाता है। 

आवश्यक प्रश्न -


प्रश्न: क्या गुंदों को उबालें बिना बीज निकाल सकते हैं?

उत्तर: हाँ, खट्टी छाछ में डालकर बीज निकाल सकते हैं, जिससे लिपलिपा प्रदार्थ हाथों के नहीं चिपकता है।

प्रश्न: गुंदों की सब्जी बनाने के लिए साथ क्या मिला सकते हैं?

उत्तर: कैरी और गुंदा की बढ़िया सब्जी बनती हैं। आप चाहे तो दाना मैथी के साथ भी बना सकते हैं। 

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