शिक्षित बेरोजगारी। Educated Unemployment

शिक्षित बेरोजगारी का अर्थ ऐसी बेरोजगारी से जिसमें शिक्षा प्राप्त किए हुए युवाओं को रोजगार की प्राप्ति नहीं होना। शिक्षित बेरोजगारी में उन्हीं लोगों को सम्मिलित किया जाता है, जिन्होंने एक विशेष शिक्षा की प्राप्ति की है, लेकिन उन्हें रोजगार की प्राप्ति नहीं हुई। एक विशेष स्तर की (दसवीं, बारहवीं, स्नातक) शिक्षा को प्राप्त कर लेने के बावजूद भी रोजगार का नहीं मिलना शिक्षित बेरोजगारी कहलाता है। 
भारत में जिस रफ्तार से पिछले कुछ दशकों में शिक्षा को बढावा मिला और जिस संख्या में शिक्षित जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उस रफ्तार के कई गुना में शिक्षित बेरोजगारी पैदा हुई है। पहले एक दौर में शिक्षित बेरोजगारी केवल शहरो तक सीमित थी लेकिन वर्तमान में दिनोंदिन खुलते विश्वविद्यालयों की संख्या से ग्रामीण क्षेत्रों में भी शिक्षा को बढावा मिला तो साथ ही शिक्षित बेरोजगारी में भी वृद्धि हुई।

शिक्षित बेरोजगारी - अर्थ और परिभाषा 


शिक्षित बेरोजगारी से अभिप्राय ऐसी बेरोजगारी से जिसमें एक व्यक्ति (खासतौर से युवा) द्वारा एक विशेष स्तर माध्यमिक, उच्च माध्यमिक, स्नातक और परास्नातक तक की शिक्षा प्राप्त कर लेने के बावजूद भी उस व्यक्ति को उसकी शैक्षिक योग्यता के अनुरुप रोजगार का ना प्राप्त होना शिक्षित बेरोजगारी कहलाता है। उदाहरण के लिए उमेश जो की भिलाई गॉव का रहने वाला है, उसने 12 वीं तक की पढ़ाई गांव से करने के बाद नजदीक के शहर से कला वर्ग में स्नातक (बी. ए.) किया। स्नातक होने के बाद से उसने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया, लेकिन उसे कोई रोजगार नहीं मिला। उसे मजबूरी में अपने पिता की छोटी सी दुकान पर बैठना पड़ रहा है। ऐसे में उमेश के पास अपने पिता की सहायता करने का एक छोटा सा रोजगार है, जो उसकी स्नातक की शैक्षिक योग्यता के अनुरुप नहीं है। शैक्षिक योग्यता के अनुरुप रोजगार का नहीं होने से उमेश शिक्षित बेरोजगारी का हिस्सा है। 
कुल शिक्षित जनसंख्या में बेरोजगारी की दर को ज्ञात करने के उदेश्य से आंकड़े प्रतिवर्ष राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन द्वारा जारी किए जाते हैं। 

शिक्षित बेरोजगारी - एक समस्या


शिक्षित बेरोजगारी खासतौर से भारत में एक भीषण समस्या बन गई है। प्रतिवर्ष लाखो विद्यार्थी स्नातक और परास्नातक तक की उपाधियां ग्रहण कर रहे हैं, किन्तु उन्हें उपाधियाँ प्राप्त करने के बावजूद रोजगार नहीं मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षो के आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो प्रतीत होता है कि शिक्षित युवाओं में सर्वाधिक बेरोजगारी बढ़ी है।
शिक्षित बेरोजगारी की दर बढ़ने से समाज के सामने संकट खड़ा हो रहा है। एक तरफ जहां शिक्षित वर्ग की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर इनकी योग्यता के अनुरुप रोजगार के अवसर पर विचार नहीं किया जाना और शिक्षा प्रणाली में सुधार नहीं किया जाना बेरोजगारी को बढावा देने के समान है। भारत की दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी इसके लिए जिम्मेदार है। शिक्षा प्रणाली काम की कुशलता को गौण मानकर शब्द ज्ञान पर अधिक जोर देती है। सही मायनों में हमारी शिक्षा वयवस्था संचार और व्यक्तित्व सुधार पर तो ध्यान दे रही है किन्तु कुशलता अब भी गौण है।

शिक्षित बेरोजगारी का स्वरूप - 


भारत में शिक्षित वर्ग में पायी जाने वाली बेरोजगारी का स्वरूप समान नहीं होता है। इस वर्ग की बेरोजगारी में विभेद किया जा सकता है, सामन्यतः इसे दो भागों में बांटा जा सकता है - 
  • दृश्य बेरोजगारी - ऐसी बेरोजगारी जिसे आप आसानी से पहचान सकते हैं। बेरोजगारी के इस स्वरुप में व्यक्ति कोई काम नहीं करता सिवाय काम की तलाश के। यह भीषण बेरोजगारी को खुली बेरोजगारी के समान है। उदाहरणार्थ महेश स्नातक करने के बाद सिर्फ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है अर्थात्‌ सरकारी सेवा की तलाश कर रहा है, यह पूर्ण रुप से दृश्य बेरोजगारी हैं। 
  • अदृश्य बेरोजगारी - इस स्वरुप में व्यक्ति काम तो करता है किन्तु उसके काम करने से उत्पादन में कोई प्रभाव नहीं होता है, ना ही उसके काम करने या छोड़ने का कोई असर उत्पादन पर होता है। इस प्रकार की बेरोजगारी में व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार काम ढूँढने में सफ़ल नहीं हो पाता है। उदाहरणार्थ सोहन स्नातक करने बाद काम नहीं मिलने के कारण अपने खेत में काम करने लग गया। उसके खेत में काम करने के बावजूद भी उत्पादन (40 क्विंटल गेंहूं) पिछले वर्ष के समान ही बना रहा जिसका अर्थ है कि उसके काम करने से उत्पादन पर प्रभाव नहीं हुआ अर्थात् यह छिपी हुई बेरोजगारी है। 

शिक्षित बेरोजगारी में आजकल एक निश्चित समय तक संविदा के तौर पर कार्य करने वाले व्यक्तियों में मौसमी बेरोजगारी भी पायी जाती है लेकिन इस प्रकार की बेरोजगारी का हिस्सा बहुत ही कम है। 

शिक्षित बेरोजगारी के कारण -


पिछले कुछ समय (दशक) से लगातार शिक्षित बेरोजगारी की दर बढ़ रही है। वर्तमान समय में, अनपढ़ समूह के मुकाबले में शिक्षित वर्ग में अधिक बेरोजगारी है। शिक्षित वर्ग को उनकी योग्यता के अनुरुप कार्य नहीं मिल रहा है। शिक्षित वर्ग को रोजगार प्राप्त नहीं होने के कारण निम्नलिखित है - 

  • दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली - भारत की शिक्षा प्रणाली रोजगारोन्मुखी नहीं है। इस प्रकार कि शिक्षा से किसी प्रकार के कौशल का निर्माण और विकास संभव नहीं है। भारतीय शिक्षा व्यवस्था महज बाबू बनाने के लिए दी जाती है। ऐसे में बढ़ती शिक्षित जनसंख्या के साथ बेरोजगारी भी बढ़ रही हैं। 
  • शारीरिक श्रम - पढ़े-लिखे युवक कम शारीरिक परिश्रम वाले कार्य करना चाहते हैं। कम शारीरिक परिश्रम वाले कार्यो में उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप वेतन नहीं होने के कारण वो इस प्रकार का कार्य ही नहीं करना चाहते जिसके कारण वह बेरोजगार ही रह जाता है। दूसरी तरफ बढ़ती हुई शिक्षित जनसंख्या के अनुरूप सरकारी बाबू और कम परिश्रम वाले रोजगार सभी को उपलब्ध किया जाना संभव नहीं है। 
  • तकनीक - बदलती तकनीक के साथ बाबू और कम परिश्रम वाले कार्य कंप्यूटर और मशीनों से किए जाने लगे हैं, साथ ही कई अन्य प्रकार के कार्य भी मशीनों से होने के कारण बदलती परिस्थितियों में बदलती तकनीक के साथ सामंजस्य स्थापित कर बराबर रोजगार मांग को पूर्ति को बराबर किया जाना संभव प्रतीत नहीं हो रहा है। 
  • सामाजिक आकांक्षाओं - पढ़े-लिखे युवको से समाज अधिक अपेक्षा करता है, इसी अपेक्षा और आकांक्षाओं के कारण कई युवा छोटे-मोटे काम करना अपनी शान के खिलाफ समझने लगते हैं। समाज की अपेक्षाओं से युवा जो अपनी शान बना लेते हैं, यह झूठी शान उनके लिए दुखदायी बनकर बेरोजगारी का दंश देती है। बढ़ती शिक्षित जनसंख्या के साथ लोगों और युवाओं सभी को समाज के साथ रोजगार की सीमाओं की जानकारी के मुताबिक अपेक्षा करनी होती है लेकिन लोग उनसे अधिक अपेक्षा कर बैठते हैं। 
  • राजनैतिक कारण - वर्तमान समय में राजनेताओ से झूठी अपेक्षा और  राजनैतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लालच देने के उदेश्य से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं। बाजार में उपलब्ध अवसरों को बिना पहचाने इतने विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं, जो बाजार में उपलब्ध शिक्षत वर्ग के लिए रोजगार अवसरों के मुकाबले से अधिक है। दूसरी ओर आवश्यकता से अधिक खुले विश्वविद्यालयों में मांग के मुताबिक शिक्षक नहीं होने के कारण और कौशल की शिक्षा नहीं होने से बेरोजगार होने का प्रशिक्षण संस्थान बनकर रह गए हैं ऐसे शैक्षिक संस्थान। 
  • रोजगार के अवसर - जिस हिसाब से महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और शिक्षित युवाओं की संख्या बढ़ रही है, उस संख्या के अनुरुप रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। जब रोजगार के अवसर सभी को समान रूप से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं तो ऐसे में बेरोजगारी को बढावा दिनोदिन मिल रहा हैं।
  • व्यवसायोन्मुख शिक्षा का अभाव - भारतीय शिक्षा शब्द ज्ञान देने के साथ बाबू बनाने वाली शिक्षा है, जो व्यक्ति को अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने योग्य शिक्षा नहीं दे पाती है। 

बेरोजगारी एक जटिल समस्या है। यह शिक्षा के साथ तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में पढ़ा-लिखा युवा अपना स्वयं का रोजगार स्थापित करने की बजाय सरकारी नौकरी के भरोसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। अगर सरकारी क्षेत्रो पर नजर दौड़ाई जाए तो यह क्षेत्र युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने की बजाय समाज पर ही भार बने हुए हैं। विभिन्न सरकारी संस्थाओं की आय इतनी भी नहीं है कि वो अपने कर्मचारियों को वेतन दे सके। सरकार पहले से चल रहे संस्थानों को राजनैतिक उद्येश्यों से चलाने के लिए प्रतिबद्ध है, ऐसे में समाज को स्वयं समझना होगा बेरोजगारी की मुक्ति के लिए। 

शिक्षित बेरोजगारी के परिणाम - 


समाज में दिनों दिन बढ़ रही बेरोजगारी समाज के लिए ही घातक बन गई है। बेरोजगारी बढ़ने के साथ ही समाज में कई प्रकार की समस्याएं बढ़ गई है। बढ़ती बेरोजगारी के कारण समाज को निम्नलिखित परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।

  • अपराध वृद्धि - बढ़ती बेरोजगारी के कारण समाज में अपराध बढ़ रहे हैं। बेरोजगार युवा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए रोजगार के अभाव में अपराध की राह पर चल दिये हैं, जिससे समाज में लूट, हत्या और चोरी जैसे घिनौने अपराध दिनोदिन बढ़ रहे हैं। 
  • श्रम शोषण - बेरोजगारी अधिक होने का कारण काम के मुकाबले में अधिक कामगार। बढ़ती कामगारों की संख्या ने रोजगार को अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया है, जिसके कारण युवा वर्ग के साथ ही अन्य कामगारों को उनके काम के अनुपात में वेतन नहीं मिल पा रहा हैं। 
  • संसाधनो का दुरुपयोग - मानव भी एक संसाधन ही है। अगर मानव को उसकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिल रहा है तो उसका दुरुपयोग हो रहा है। दूसरी ओर बढ़ती बेरोजगारी के कारण अन्य प्राकृतिक और सतत संसाधनो का भी नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि बेरोजगारी के कारण संसाधनो के उपयोग के लिये साधनो को जुटा पाना संभव नहीं होता। जैसे बेरोजगारी के कारण व्यक्ति अपनी दुकान में सामान खरीद इसे संचालित कर सके इसके लिए पूंजी भी नहीं जुटा पाता, जिससे दुकान का दुरुपयोग होता है। 
  • कौशल अभाव - बेरोजगारी बढ़ने से व्यक्ति को काम नहीं मिल पाता, उसे जो काम आता है वो काम भी निरंतर अभ्यास के अभाव में भूलने लगता है। यही कारण है कि जो अभ्यास नहीं करते वो अपने हुनर को भूल जाते हैं और अन्य लोगों को भी सीखा नहीं पाते हैं। 
  • नए रोजगार का संकट - जब समाज में अत्यधिक बेरोजगारी हो जाती है तो निवेश रुक जाता है। निवेश के रुक जाने से नए रोजगारों का सृजन समाप्त हो जाता है। इससे बेरोजगारी पहले से भी तेज गति से बढ़ने लगती हैं। 
  • मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर - जिन लोगों के पास रोजगार नहीं होता बेरोजगार होते हैं वो सुबह से शाम तक रोजगार के बारे में सोचते रहते हैं। रोजगार ना होने का तनाव और आवश्यकता से अधिक सोचना दोनों व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। 
  • गरीबी को बढावा - बेरोजगार व्यक्ति के पास आय का स्त्रोत नहीं होता है। आय के स्त्रोत के अभाव में वह व्यक्ति उन सभी कार्यो को नहीं कर पाता है, जो उसके लिए किए जाने आवश्यक अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए। काम और आय दोनों का अभाव गरीबी को बढावा देता है। 

बेरोजगार युवा सुबह से शाम तक सड़कों पर भटकते रहते हैं। उनके पास काम नहीं होने से अपने हुनर को भी भूल जाते हैं। दूसरी ओर रोजगार का तनाव उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। ऐसे में इनका खाली दिमाग शैतान का घर बनकर रह जाता है। ये लोग जुआ, नशा और विभिन्न प्रकार के अपराध की राह को अपना समाज के लोगों को ही अपना शिकार बना लेते हैं। 

शिक्षित बेरोजगारी के समाधान -


शिक्षित बेरोजगारी एक भयंकर समस्या है। बेरोजगारी का प्रभाव सरकार की अपेक्षा समाज पर अधिक पड़ता है। सरकार भी समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, ऐसे में समाज और कल्याणकारी सरकार दोनों का फर्ज बनता है कि वो बेरोजगारी का निदान करने के लिए आवश्यक कदम ले, जो कुछ निम्न हो सकते हैं। 

  • शिक्षा प्रणाली में सुधार - भारतीय शिक्षा प्रणाली रोजगार के लिए कौशल देने से अधिक विश्वास शब्द ज्ञान में करती है। यह शिक्षा सरकारी बाबू तैयार करने वाली शिक्षा है उसी का परिणाम है कि आज आधे से अधिक शिक्षित बेरोजगार सरकारी सेवा हासिल करने के लिए के लिए कोचिंग ले रहे हैं। समाज और सरकारों का दायित्व बनता है कि हमे इस मकड़जाल से निकाला जाए ताकि शिक्षा व्यवस्था बाबू बनाने वाली मात्र न रहकर रोजगारपरक बन सके। 
  • सरकारी बाबू की मानसिकता को समाप्त किया जाना -  आधे से अधिक शिक्षित बेरोजगार कोचिंग संस्थानों में होने का कारण सरकारी बाबू बनने की मानसिकता के कारण हैं। युवाओं को सरकारी बाबू बनने वाली मानसिकता से जिस दिन बाहर निकाल दिया जाएगा उस दिन बेरोजगारी ही समाप्त हो जाएगी। 
  • पारिश्रमिक विभेद समाप्त किया जाना - सरकारी और निजी संस्थानों में वेतन भत्तों में भारी विभेद है। सरकार अगर निजी क्षेत्रों में वेतन बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पा रही है तो सरकारी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन को कम बढ़ाकर या किसी अन्य तरीके से ही सही दोनों क्षेत्र के विभेद को समाप्त कर दे तो बेरोजगारी पर गहरा प्रहार हो सकता है। 
  • रोजगार और व्यावसायिक शिक्षा - भारत की शिक्षा प्रणाली बहुत अधिक दोषपूर्ण है, रोजगार प्राप्ति में सहायक नहीं है। शैक्षिक संस्थान सरकारी बाबू बनाने वाली दोषपूर्ण शिक्षा देने की बजाय अगर रोजगार का सृजन करने वाली उद्यमियों की शिक्षा दे तो समाज के सामने अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और बेरोजगारी पर गहरा आघात होगा। 
  • निवेश को बढावा - समाज और सरकार दोनों को आवश्यकता है कि उपभोग की बजाय निवेश को बढावा दे। जब निवेश को बढावा दिया जाने लगेगा को उद्योग-धंधों का प्रसार-प्रचार होगा। उद्योग-धंधों के बढावे से नए रोजगारों का सृजन होगा। नए रोजगार बनने से बेरोजगारी स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। 
  • राजनैतिकता लालच को समझना - राजनेताओ द्वारा महाविद्यालय और विश्वविद्यालय खोलने वाला लालच शिक्षा को बढावा देने के स्थान पर बेरोजगारों की फौज को खड़ा कर रहा है। ऐसे में हमारी जिम्मेदारी बनती है कि राजनैतिक लालच में आने की बजाय आवश्यकता के अनुसार ही विश्वविद्यालय की मांग करे ताकि बेरोजगारों की फौज को रोका जा सके। 
  • रोजगार के अवसर बढ़ाना - रोजगार के अवसरों को बढावा दिए बिना अर्थात् नए उद्योग-धंधों को स्थापित किए जाएं।  सरकार की जिम्मेदारी बनती है की स्वयं और उद्यमियों को सहायता प्रदान करे ताकि रोजगार बढ़ सके। 

समाज में बेरोजगारी का होना उचित नहीं है। इससे अपराध बढ़ते हैं, ऐसे में हमारी जिम्मेदारी इसे समाप्त किए जाने की है। समाज की जिम्मेदारी बनती है बच्चों को सरकारी बाबू बनने की बजाय उद्यमिता की तरफ बढ़ाए। साथ ही समाज की जिम्मेदारी बनती है कि जो राजनैतिक दल सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों को वेतन भत्ते बढ़ाने पर जोर दे उनका निष्कासन करे। आज बेरोजगारी से लड़ना समाज से अधिक हमारी जिम्मेदारी बनती है और हमे इसके खिलाफ लड़ना ही होगा। 

अन्य प्रश्न - 


प्रश्न: शिक्षित बेरोजगारी का अर्थ क्या है?. 

उत्तर: शिक्षित बेरोजगारी का अभिप्राय एक विशेष स्तर की शिक्षा प्राप्त कर लेने के बावजूद उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुरुप या बिल्कुल भी रोजगार और काम नहीं मिलने से है। 

प्रश्न: बेरोजगारी के आंकड़े कौन जारी करता है? 

उत्तर: राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संस्थान (National Sample Survey Organisation) 

प्रश्न: भारतीय शिक्षा प्रणाली रोजगार दिलाने में सहायक क्यों नहीं है? 

उत्तर: भारतीय शिक्षा प्रणाली शब्द ज्ञान पर अधिक जोर देती है जिसके कारण यह बाबू बनाने वाली शिक्षा प्रणाली है ना की कौशल विकास से रोजगार दिलाने वाली। 

प्रश्न: भारत में वर्तमान सर्वाधिक बेरोजगारी किस प्रकार की है? 

उत्तर : शिक्षित बेरोजगारी। 

प्रश्न: भारत में शिक्षित बेरोजगारी के सर्वाधिक होने का कारण क्या है? 

उत्तर: भारतीय शिक्षा प्रणाली बाबू बनाने वाली प्रणाली है, जो सभी को रोजगार दिलाने में सहायक नहीं है। ऐसे में बाबू बनने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है उन्हीं प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति आकर्षित हो आज बहुत अधिक युवा बिल्कुल ही दृश्य बेरोजगार बने हुए हैं। 

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