दुनिया का एकमात्र अनोखा घंटाघर है जोधपुर शहर में। Ghantaghar Jodhpur

घंटाघर एक ऐसा ऊंचा भवन या इमारत है, जिस में घड़ी लगी हुई होती है। घड़ी के घंटे की आवाज बहुत दूर तक सुनाई देती है। इसे अंग्रेजी भाषा में Clock Tower कहा जाता है यानी घड़ी की मीनार। चौकोर मीनार में चारो और घड़ी लगी हुई होती है जिसके कारण चारो तरफ से इसे देखा जा सकता है।
दुनिया का एकमात्र अनोखा घंटाघर है जोधपुर शहर में। Ghantaghar Jodhpur


जोधपुर में भी पुराने समय की घड़ी लगी हुई एक घंटाघर है। यहां भी पुराने जमाने की विशाल घड़ी लगी हुई हैं, जिसे देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखो देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। जहां घड़ी वाली इमारत बनी हुई है, उस क्षेत्र (चोपड़) को घंटाघर के नाम से ही जाना जाता है। यह क्षेत्र जोधपुर शहर का हृदय स्थल है। इस क्षेत्र की जोधपुर में पहचान घंटाघर के साथ एक बाजार के रूप में भी है।

जोधपुर घंटाघर - एक झलक


जोधपुर घंटाघर एक पर्यटन स्थल है, लाखो सैलानी प्रतिवर्ष पर्यटन के उदेश्य से आते हैं। साथ ही घंटाघर जोधपुर का एक मुख्य बाजार है, जहां आप रसोई से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान ले सकते हैं। कपड़े, खाने-पीने का सामान, पुस्तके, सौंदर्य प्रसाधन, पर्यटन में उपयोग का सामान और किराणा का सामान का बड़ा बाजार है। यहां प्रति दिन हजारों लोग खरीदारी में व्यस्त रहते हैं तो कई पर्यटक (देशी-विदेशी) इस नजारे को साक्षात आँखों के केमरा में कैद करने के लिए आते हैं। घंटाघर में रंग-बिरंगे वस्त्र पहने महिलाएं, ठेठ गांवों की वेषभूषा पहने ग्रामीण और शहर के आधुनिक युवक यहां प्रतिदिन खरीददारी और पर्यटन के उदेश्य से आते हैं। जोधपुर शहर का यह एकमात्र बाजार है, जहां राजस्थान की झलक यहाँ पहुंचे लोगों और बाजार में देखने को मिलती है। पर्यटन के साथ ही संस्कृतिक विषय के शोधार्थी भी शोध के उदेश्य से पहुंचते हैं।

यह बाजार जोधपुर जंक्शन से महज 2 किलोमीटर दूर है तो दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट से 4 किलोमीटर दूर है। रोडवेज निगम से दूरी चंद कदमों की होने के कारण ही इसे आप ब्लू सिटी जोधपुर का द्वार कहे तो कोई गलती नहीं होगी। अधिकांश सैलानी यहाँ पहुंचने के बाद जोधपुर के अन्यत्र पर्यटन स्थलों की ओर जाते हैं। ऐसे में आप चारदीवारी (दोनों साइड दो बड़े दरवाजे जिन्हें स्थानीय लोग पॉल कहते हैं) में बंद बाजार के बीच में घंटाघर के चारो और छोटी-छोटी पुरानी वास्तुकला से बनी दुकानों पर हजारों लोगों को देख सकते हैं। हज़ारो गृहणियां हर रोज रसोई का सामान खरीदने आती है तो हजारों ग्रामीण त्योहार और शादी-ब्याह की खरीददारी के लिए पहुंचते हैं। 

जोधपुर घंटाघर - मनमोहक दृश्य


जोधपुर पहुंचने वाले सैलानी नई सड़क के रास्ते से गिरदीकोट द्वार से घंटाघर पहुंचते हैं। पुराने ज़माने का जोधपुर के पत्थर से बना यह द्वार भी पाश्चात्य काल की अनुपम वास्तुकला की सुन्दरता को स्वयं में लपेटे हुए खड़ा है। तोरणनुमा इस द्वार से घंटाघर के मुख्य बाजार (सरदार मार्केट) में प्रवेश होता है। बाजार के चौक के बीच में घंटाघर बना हुआ है। इस चौकोर मीनार में चारो दिशाओं में बड़ी-बड़ी घड़ियां लगी हुई है। घंटाघर में लगी घड़ियाँ सभी दिशाओं से साफ दिखती है। घड़ी को नजदीक से देखने के लिए आप 10 रुपये की टिकट लेकर इस तीन मंजिला मीनार के उपरी हिस्से में पहुंच इसे नजदीक से भी देख सकते हैं। 

बाजार की बीचोबीच घंटाघर होने के कारण यहां पहुंचने वाले लोग आपको बाजार में खरीददारी करते हुए भी दिखते हैं तो कई ग्रामीण जो खरीददारी के उदेश्य से पहुंचे वो भी यहां ग्रामीण राजस्थान की संस्कृति की अनुपम झलक को पेश करते हैं। सौंदर्य प्रसाधन और रसोई का सामान खरीदने के लिए आने वाली गृहणियां और बच्चे भी इस दृश्य को और अधिक मनोरम बना देते हैं। एक तरफ यहां घंटाघर और बाजार वास्तुकला की झलक पेश करते है तो दूसरी ओर बाजार राजस्थान के परंपरागत पौशाक, हस्तशिल्प और कला का प्रदर्शन करते हैं। इस बाजार में आने वाले विदेशी सैलानियों को भी आप इन बाजारों में खरीददारी करते हुए देख सकते हैं। 

घंटाघर जोधपुर - ऐतिहासिक महत्व


घंटाघर का निर्माण जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह ने कराया। इसका कार्य वर्ष 1910 में शुरु हुआ जो 1912 में पूरा हुआ। घंटाघर क्षेत्र एक बाजार है, जो चौकोर चारदीवारी है। द्वार से अंदर घुसते है तो चौक के बीच में 98 फीट की ऊंचाई का घंटाघर बना है। इसके चारो ओर 25-25 ऐतिहासिक दुकाने बनी हुई हैं। घंटाघर की मीनार 3 मंजिला जोधपुर के पत्थर से पाश्चात्य वास्तुकला से बनी हुई है, जिसमें ऊपरी (तीसरी) मंजिल पर 6 फीट की घड़ी लोहे की दो भारी गार्डर के सहारे से लगी हुई हैं। जोधपुर के घंटाघर में लगी हुई घड़ी ऐतिहासिक है और दुनिया में ऐसी केवल दो ही घड़ी है, एक लंदन के घंटाघर में लगी हुई है तथा दूसरी जोधपुर घंटाघर में। जोधपुर के घंटाघर में लगी हुई घड़ी ऐतिहासिक होने के साथ ही आम घड़ी की तरह नहीं चलती हैं, इस घड़ी में सप्ताह में एक बार चाबी भरी जाती है। 
दुनिया का एकमात्र अनोखा घंटाघर है जोधपुर शहर में। Ghantaghar Jodhpur


जोधपुर के घंटाघर की यह घड़ी मुंबई की कंपनी लूंड एंड ब्लोकली द्वारा बनाई गई। उस वक्त घड़ी बनाने का खर्च 3 लाख रुपये आया, इसमे 1 लाख रुपये तो घड़ी बनाने वाली कंपनी को सिर्फ इसलिए दिया ताकि वो ऐसी घड़ी कभी और ना बनाये। घड़ी बनाने का खर्च 1 लाख और लगाने का खर्च भी 1 लाख हुआ। इस घड़ी के चारो दिशाओं में लगे होने के साथ ही चारो डायल आपस में जुड़े हुए हैं। घड़ी को संचालित करने के लिए इसमे डायल से जोड़कर भार लगे हुए हैं जैसे घड़ी के सूइये चलते है यह भार नीचे आ जाते हैं। यह भार एक सप्ताह में पूरी तरह से नीचे आ जाता है, तब वापस चाबी भर इन्हें पुनः ऊपर किया जाता है। घड़ी के सभी डायल 6 फीट लंबे और 2 फीट चौड़े है। घड़ी का पेंडुलम 50 किलोग्राम वजनी है। 

 इस घड़ी में बजने वाले टंकोर की दो तरह की आवाज है, जो समय के अनुसार आती है। एक टंकोर हर 15 मिनट में (सवा, आधा, पौन, घंटा) में बजता है तो दूसरा प्रति घंटे। पहले प्रकार का टंकोर सवा में (15 मिनट) 2 टंकार, आधा में (30 मिनट) 4 टंकार, पौन में (45 मिनट) 6 टंकार घंटा (00) में आठ टंकार की आवाज आती है। घण्टे वाली आठ टंकार के बाद को समय हुआ या जीतने बजे (जैसे 1 बजा, 2 बजा...) उतने ही टंकार अलग से बजते है जिनकी आवाज पहले के आठ टंकार से अलग होती है। जोधपुर के घंटाघर का रख-रखाव एक ही परिवार (अल्ला नूर का परिवार) करता है, इसी परिवार के सदस्य ही घड़ी में चाबी भरने का कार्य करता है। 

देश में अन्य खास घंटाघर - 


20 वीं सदी के शुरुआत में घड़ी खरीदना हर किसी के वश में नहीं था। घड़ी का मूल्य बहुत अधिक होता था। दूसरी ओर शहर की मीलों (फैक्ट्रियों) में काम करने वाले लोगों को समय देखने की आवश्यकता होती थी। लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए घंटाघर का निर्माण करवाया गया। भारत के कई शहरो में घंटाघर बने हुए हैं उस जमाने के। सभी घंटाघर में कुछ खास है तो देखते हैं एक नजर में ऐसे घास घंटाघर जो अपने किसी अद्वितीय उदाहरण या विशेषता के कारण दुनिया में अपनी पहचान रखते हैं, ऐसे कुछ खास घंटाघर - 
क्र. सं.  घंटाघर  विशेषता 
1 लखनऊ  देश का सबसे ऊंचा (221 फीट) 
2 देहरादून  षट्कोणीय जिस पर 6 घड़ी 
3 मेरठ  टंकार की आवाज 15 किलोमीटर तक सुनाई देती थी 
4 मुंबई  85 फीट ऊंचाई (राजाबाई) 
5 मैसूर  जॉर्ज पंचम के शासनकाल की सिल्वर जुबली के उपलक्ष्य में निर्माण 
6 मुंबई  छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (विश्व धरोहर में शामिल) 
7 धौलपुर  निहाल टॉवर 600 किलोग्राम का घंटा 
8 दिल्ली  शाहजहानाबाद 1870 में बना भारत का पहला घंटाघर 
9 सिकंदराबाद  122 फीट ऊंचा 
10 श्रीनगर  लाल चौक (ऐतिहासिक रक्तपात का गवाह) 

घंटाघर जोधपुर - वास्तुकला का अद्वितीय नमूना


जोधपुर का घंटाघर जोधपुर के बलुआ पत्थर से स्थापत्य कला से बना हुआ है। तीन मंजिला इस मीनार में भी तीन तरीके की कला को स्पष्ट देखा जा सकता है। सबसे नीचे जमीन पर चौड़ी संरचना है, फिर मीनारनुमा टॉवर और सबसे ऊपर शिखर। पत्थर से बने हुए घंटाघर में उत्कृष्ट कलाकारी का कार्य हो रखा है। चीनाई का भी उत्कृष्ट कार्य होने के साथ ही इसे देखने के लिए भी टिकट की व्यवस्था है, टिकट लेकर आप इसे अंदर से भी देख सकते हैं। घंटाघर की उपरी मंजिल से मेहरानगढ़ और सूर्य नगरी जिसे आप ब्लू सिटी कहते हैं का भी खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। 

जोधपुर का घंटाघर बाजार के मध्य है। सरदार मार्केट में घंटाघर के चारो ओर बलुआ पत्थर से 25-25 दुकाने भी स्थापत्य कला से बनी हुई है। यहां आने वाले सैलानी घंटाघर के साथ ही बाजार में पुराने ज़माने की बनी हुई दुकानों की भी नक्काशी को निहार मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। घंटाघर के सरदार बाजार में प्रवेश के लिए द्वार बना हुआ है, इस पर भी उत्कृष्ट नक्काशी का कार्य हो रखा है कई लोग इस द्वार के फोटो लेते हुए भी नजर आते हैं। कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि जोधपुर के लाल बलुआ पत्थर पर नक्काशी और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है, जोधपुर का घंटाघर। घंटाघर का शिखर किसी हवेली की याद दिलाता है, लाल पत्थर से बना यह शिखर सामन्यतः जोधपुर के आसपास बनी छतरियों के शिखर से मिलता-जुलता है। 

घंटाघर और लोक गीत - 


जोधपुर का घंटाघर 1912 मे निर्मित होने के कारण यह एक सदी से भी पुराना हो चुका है, ऐसे में घंटाघर पर भी लोकगीत गाए जाते हैं। ये लोकगीत जोधपुर की ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र करते हुए गाए जाते हैं। 

फाल्गुन महीने में फाग गीतों में एक 
"जोरजी चम्पावत..... घंटे-घंटे घड़ियां लागे रै कै गीरदीकोट में।" 

ऐसे ही कुछ अन्य लोकगीत भी है जिनमे घंटाघर घूमने या शौपिंग का जिक्र किया गया है। शादी-ब्याह में पुराने जमाने में घंटाघर से ही खरीदारी होने के कारण आज भी लोकगीतों में घंटाघर से खरीददारी के जिक्र वाले लोकगीत गाए जाते हैं। 

संबंधित प्रश्न -


प्रश्न: जोधपुर के घंटाघर का निर्माण किसने कराया?

उत्तर: जोधपुर घंटाघर का निर्माण महाराजा सरदार सिंह ने कराया।

प्रश्न: जोधपुर घंटाघर कहाँ है? 

उत्तर: जोधपुर रेल वे स्टेशन से 1 किलोमीटर दूर सरदार मार्केट में है, जो 98 फीट ऊंचा है। 

प्रश्न: जोधपुर घंटाघर का निर्माण कब कराया गया?

उत्तर: जोधपुर घंटाघर का निर्माण कार्य 1910 में शुरु हुआ, जो 1912 में पूरा हुआ।

प्रश्न: जोधपुर घंटाघर की घड़ी किस कंपनी ने बनाई? 

उत्तर: जोधपुर घंटाघर की घड़ी मुंबई की लूंड एंड ब्लोकनी कंपनी द्वारा बनाई गई।

प्रश्न: जोधपुर घंटाघर की घड़ी को बनाने में कुल कितना खर्चा आया?

उत्तर: जोधपुर घंटाघर की घड़ी को बनाने का 1 लाख रुपये, लगाने का 1 लाख और कंपनी ऐसी कोई दूसरी घड़ी ना बनाये इसके लिए 1 लाख रुपये और दिए गए, ऐसे में जोधपुर घंटाघर की उस ज़माने में कुल लागत 3 लाख रुपये आई। 

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