टांका: मरुस्थल में वर्षा जल संग्रहण का स्त्रोत। Tanka

टांका: मरुस्थल में वर्षा जल संग्रहण का स्त्रोत। Tanka

टांका मरुस्थल में जल संग्रहण का स्त्रोत है। राजस्थान के मरूस्थली हिस्सों में बरसात के जल को संग्रहित करने के लिए जमीन में एक गड्ढा खोदकर भूमिगत सरोवर अथवा कुंड है। परंपरागत रुप से टांका गोलाकार आकृति का भूमिगत कुंड है जो ऊपर से ढंका हुआ होता है, किंतु वर्तमान में इसे चौकोर आकृति का भी बनाया जाता है।
टांका राजस्थान के मरुस्थलीय हिस्से का परंपरागत जल संरक्षण किए जाने का स्त्रोत है। अनियमित और कम वर्षा के कारण यहां रहने वाले लोग जल की कमी ना हो इसके लिए उच्च तापमान और वाष्पन वाले इस क्षेत्र में भूमि को ही जल सरंक्षण के लिए उपयोग करते थे। नाडी, तालाब और टांका सभी भूमि में जल संग्रहण की परंपरागत विधियाँ थी।

टांका: कैसे बनाया जाता है? कहाँ से आता है पानी? 


राजस्थान में टांका जल संग्रहण का परंपरागत स्त्रोत है। बरसों पहले भी राजस्थान मे टांके बनाये जाते रहे हैं। ऐसे में टांका बनाने की विधि को लेकर कई लोग प्रश्न करते हैं तो आइये उन्हें बता दें कि टांका कहीं भी बनाया जा सकता है। टांका बनाने के लिए सबसे पहले आपको जमीन में एक गड्ढा खोदना होगा। गड्ढा खोदने के बाद आप इसे सीमेंट इस गड्ढे में चारों और कालर की जाती है। वर्तमान में बढ़ती हुई तकनीक के साथ ही टांका बनाने की विधि में भी परिवर्तन आया है ताकि टांका को अधिक टिकाऊ और बड़ा बनाया जा सके।

वर्तमान समय टांका बनाने के लिए गड्ढा खोदने के बाद गड्ढे की दीवारों को पत्थर से बनाया जाता है अथवा कंक्रीट और सीमेंट की 1.5 फीट चौड़ी दिवारें बनाई जाती हैं। फिर इस दिवारों को सीमेंट से प्लाट किया जाता है, सीमेंट से बनी दिवारें पानी की सीजत को रोकती है। पहले इसे ढंकने के लिए एक मजबूत रोहिड़ा की लकड़ी रखकर कांटों से ढक दिया जाता है। लेकिन वर्तमान में नीचे से पत्थर से बनी दीवार को जमीन से दो फीट ऊपर उठाकर पत्थर की पट्टियों या आरसीसी कर ढक दिया जाता है।

टांके के आसपास की जमीन को कठोर कर इसके भरण के लिए आगोर बनाया जाता है। जमीन पर बने एक टांके के लिए औसतन 0.5 बीघा भूमि पर आगोर बनाया जाता है। इस आगोर की भूमि को इस तरीके से ढलान दिया जाता है जिससे सारा पानी टांके में चला जाए। इसके अतिरिक्त टांका भवन के आसपास बनाकर भवन से बहने वाला पानी भी संरक्षित किया जा सकता है। कभी खेतों में टांके पानी के बहाव के अनुसार बना खेत के पानी को संरक्षित कर लिया जाता है।

टांका बनाते समय ध्यान रखने योग्य बाते -


जब आप टांका बनाने जा रहे हैं तो आपको कुछ ऐसे तथ्यों को दिमाग में अवश्य रखना चाहिए ताकि टांका मजबूत बने और जल भरण आसानी से हो सके। ऐसे में टांका बनाते समय इन्हें ध्यान में रखे -
  • आकार - टांके का आकार सामन्यतः गोल या बेलनाकार रखा जाना चाहिए इससे टांका मजबूत बनता है। चौकोर टांके के कोनों से लीक होने की समस्या अधिक होती है क्योंकि प्लास्टर में भेद होने से पानी का रिसाव होने लगता है। गोल आकार के टांके कम निर्माण सामग्री और खर्च से भी चौकोर के मुकाबले में अधिक क्षमता के होते हैं। 
  • चूने की बजाय सीमेंट का उपयोग - चूने के मुकाबले सीमेंट के टांके अधिक मजबूत होते है, सीमेंट की दीवारों से पानी का रिसाव कम होता है।
  • पर्याप्त आगोर और जल भराव क्षेत्र - टांके के आसपास पर्याप्त जल भराव के लिए आगोर हो इसके लिए कठोर भूमि का चयन करे या किसी भवन के पास बनाये ताकि आसानी से जल भराव संभव हो। 
गोल टांके बनाने से लागत भी कम आती है और मेहनत भी कम लगती है। गोल टांके में कचरा भी चौकोर टंकी के मुकाबले में कम गिरता है। 

टांके के आसान भराव के लिए उन्नत आगोर बनाने की तकनीक - 


टांके का भराव आगोर पर निर्भर करता है। आगोर जितना कठोर होगा टांका उतना ही जल्दी भर जाएगा। खासतौर से मरुस्थल के रेतीले हिस्सों में टांका बनाया जा रहा है तो आगोर पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए, जिससे पानी आसानी से टांके में पहुंच सके। बढ़िया आगोर बनाने के लिए निम्न बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए - 
  1. दोमट मिट्टी का कठोर आगोर बनायें, जिसका ढलान टांके की तरफ हो।
  2. वर्षा जल का अफवाह बढ़ाने के लिए तालाब से काली मिट्टी लाकर आगोर में ढाली जानी चाहिए।
  3. बरसात के दिनों में आगोर को साफ और समतल कर देना चाहिए। 
  4. अनावश्यक वनस्पतियों और पत्थर साफ कर दिए जाने चाहिए। 
  5. बरसात के दिनों में पशुओं को आगोर में न जाने दे।

आजकल टांका भवन के पास भी बनाया जाता है। ऐसे में भवन के पास बनने वाले टांके में भवन से गिरने वाला पूरा पानी पहुंचे इसके लिए बेहतर नाली बनाएँ, बरसात शुरु होने से पहले नाली और भवन की छत्त को साफ कर देना चाहिए। पानी की एक एक भी बूंद बर्बाद ना हो उसके लिए नाली की बजाय छत से पाईप टांके में लगा देनी चाहिए।

टांका बनाने का लाभ -


अगर आप राजस्थान में रहते हैं तो आपने गॉवों के साथ शहरो में भी टांके देखे होंगे। आपके दिमाग में कई बार प्रश्न आता होगा कि यह शहर को घरों में छोटे-छोटे टांके क्यों बनाये जाते हैं? ऐसे टांके भी शहर के घरों में बने हुए दिख जाएंगे जो वर्षा जल के संग्रहण के लिए उपयोग में नहीं लिये जाते हैं। ऐसी क्या खास विशेषताएं हैं, जिनके चलते यह टांके शहरो में भी बनते हैं? हालांकि गॉव में तो होते ही है।
  • अधिक मात्रा में जल संग्रहण - टांके में होद या प्लास्टिक की टंकी के मुकाबले में अधिक मात्रा में जल संग्रहण की क्षमता होती हैं। 
  • वर्षा जल का संग्रहण, कम लागत - वर्षा के जल को कम लागत पर संग्रहित कर पीने के साथ ही रसोई से लेकर पशुओं को पिलाने के लिए उपयोग में लिया जा सकता है। 
  • तापमान स्थिर रहना - टांके के पानी का तापमान टंकी के पानी के मुकाबले में स्थिर रहता है। टंकी में पानी गर्मी के दिनों में अधिक गर्म हो जाता है तो सर्दी में एकदम ठंडा किन्तु टांके के जल का तापमान समान बना रहता है, जिसके कारण आप किसी भी समय पीने और नहाने के लिए उपयोग में ले सकते हैं और पशुओं को भी पीला सकते हैं। टंकी में यह गुणवत्ता नहीं होती है, इसी कारण गर्मी में पानी अधिक गर्म हो जाता है (दिन के समय में) की नहाने के लिए टंकी से निकाल सीधा प्रयोग नहीं किया जा सकता है, वैसे ही सर्दी के मौसम में भी नहाने के लिए अत्यधिक ठंडा होने से प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। 
  • साफ और शुद्ध जल - वर्षा के जल को प्राकृतिक जल का सबसे शुद्ध रुप माना जाता है। शुद्धता के कारण उन क्षेत्रो में टांके बनाकर जल को संग्रहित किया जाता है, जहां भूमि जल खारा होता है। 
टांके की इन्हीं विशेषताओं के कारण आज भी राजस्थान में घरों के आँगन और चबूतरे में टांका बनाया जाता है। गॉव में जहां जल की उपलब्धता नहीं होती है वहाँ पीने के पानी के लिए बनाया जाता है तो साथ ही गर्मी के दिनों में पशुओं को पानी पिलाने के लिए भी बनाया जाता है। 

टांके की देखभाल - 


टांका पीने के पानी के लिए बनाया जाता है, ऐसे में इस बात का ध्यान रखना होता है कि टांके का पानी पीने योग्य बना रहे। टांका भूमिगत, कुंड, खड्डा, गड्ढा और सरोवर होने के नाते इसमे संग्रहित किया गया जल भरा हुआ होता है। संग्रहित जल अथवा रुका हुआ जल कई बार बीमारियो को आमंत्रित कर देता है, ऐसे में टांके के मालिक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि टांके का जल बीमारियों को आमंत्रण ना दे। जल को दूषित होने से बचाव के लिए कदम उठाने चाहिए, जो निम्न है - 
  • सफाई - साल में कम से कम एक बार टांके की सफाई करनी चाहिए, जिससे पानी दूषित ना हो। हो सके तो साल दर साल एकबार पूरा साफ करे पूरा पानी निकालकर। 
  • आगोर की नियमित सफाई - टांके में जल भराव के लिए बनायें गए आगोर की नियमित रुप से सफाई की जानी चाहिए। टांके में कचरा सिर्फ जल अफवाह से ही नहीं जाता कई बार वायु के साथ भी कचरा गिर सकता है। साथ ही आगोर की मिट्टी को टांके में जाने से रोकने के लिए उसे कठोर बनाये रखे या सीमेंट का बना सकते हैं। 
  • आगोर में पशु ना जाने दे ना वनस्पति पनपने दे - खेत में बने टांके में पानी का भराव आगोर से होता है। आगोर में ना तो पशुओं को घुसने दिया जाए ताकि कठोरता भंग ना हो और ना ही वनस्पति को पनपने दे ताकि पशु आगोर में घुसे। इससे कचरा और मिट्टी टांके में जाने से रोकी जा सकती हैं। 
  • फिटकरी और लाल दवा डाले - अगर टांका बड़ा है नियमित सफाई संभव नहीं है, ऐसे में टांके में विषाणु पनपने का भय रहता है। विषाणुओं को पनपने से रोकने के लिए नियमित लाल दवा और फिटकरी टांके में डाली जानी चाहिए। 
  • जाली और सफाई - जल आवक और जावक के लिए बनी हुई नाली को जाली से ढककर रखा जाना चाहिए ताकि टांके में मिट्टी और कचरा जाने से रोका जा सके। 

लंबे समय तक टांके के जीवनकाल को बनाये रखने के लिये इसे लंबे समय तक खाली नहीं रखा जाना चाहिए। इसकी उम्र को बढ़ाने लिए इसमे कुछ पानी रखा जाना चाहिए, ऐसा करने से टांके की दीवारों पर दबाव कम हो जाता है और टांके की दीवारों में लकीरें नहीं आती है। टांके को फटने से बचाव के लिए भी उसमे पानी का होना जरूरी है। 

वर्तमान समय में टांके की उपयोगिता - 


वर्तमान समय में अधिकांश जगह पर नल से जल पहुंच रहा है, ऐसे में पीने के पानी के लिए टांके का महत्व कम हो रहा है। किंतु प्राकृतिक संतुलन को स्थापित करने के लिए पेड़ों की आवश्यकता दिनोदिन बढ़ रही है। पेड़ों को पानी देने के लिए और पशुपालन में उपयोग के लिए नल से जल संभव नहीं है। दूसरी ओर नल से जल नियमित रूप से दूर-दराज तक पहुंचे यह भी संभव नहीं है। अगर पहुंच जाये तो लागत क्या होगी? 
आज भी जल को कम लागत पर अधिक मात्रा में संग्रहित कर समय पर उपलब्धता के लिए टांके की आवश्यकता होती है। इसी कारण सरकार भी टांका बनाने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है। टांका ना सिर्फ पानी को संग्रहित कर पा रहा है बल्कि भूमि जल दोहन को भी कम करने में उपयोगी साबित हो रहा है। 

आवश्यक प्रश्न - 


प्रश्न: टांका क्या होता है? 

उत्तर: टांका भूमि में बनाया गया एक खड्डा होता है, जिसमें वर्षा जल को संग्रहित किया जाता है। 

प्रश्न: टांका किसे कहते हैं? 

उत्तर: भूमि में बनाया जाने वाला जल सरोवर जिसमें वर्षा जल को संग्रहित किया जाता है। 


प्रश्न: मरूस्थल में परंपरागत जल संरक्षण के स्त्रोत क्या है? 

उत्तर: टांका, नाडी और तालाब परंपरागत जल संरक्षण के स्त्रोत है। 

प्रश्न: टांके और नाडी में अन्तर क्या है? 

उत्तर: टांका सीमेंट या चूने की लेप वाली दीवारों से ऊपर से ढंका हुआ भूमिगत जल स्त्रोत है, वहीं नाडी खुला जल स्त्रोत है, जिसमें दिवारें नहीं होती है। 

प्रश्न: टांका और बावङी में अन्तर क्या है?

उत्तर: टांका वर्षा जल के संग्रहण के लिए बनाया जाता है तो बावङी भूमिगत जल का स्त्रोत है। 

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