आज सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट देखते हुए मेरे सामने एक सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई कट ऑफ की जानकारी आई। जब मैने उस जानकारी को देखा तो देखने के बाद आश्चर्य में मेरी आँखें खुली ही रह गई।
कम नंबर लाकर आरक्षण के चलते लोग विभिन्न नौकरियों में चयनित हो जाते हैं—ऐसी खबरें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। इससे आरक्षण के नुकसान भी गिनाए जाते हैं। लेकिन यह सच है कि आरक्षण ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को समान अवसर देने का साधन है। इसका उद्देश्य प्रतिभा को नकारना नहीं, किंतु आज यह सब उल्टा होता हुआ प्रतीत होता है।
आज आरक्षित वर्ग की मेरिट अनारक्षित वर्ग से ऊपर जा रही हैं। हाल ही राजस्थान पुलिस भर्ती परीक्षा में एक ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थी का चयन नहीं होने के बाद उसने पुलिस विभाग से सूचना के अधिकार तहत जानकारी निकाली। पता चला कि उसे सामान्य वर्ग के मुकाबले में अधिक अंक प्राप्त हुए हैं किंतु उसका चयन नहीं हुआ है।
क्या है मामला -
यह मामला राजस्थान पुलिस कांस्टेबल भर्ती 2025 से जुड़ा है, जिसमें श्री बंशीलाल (निवासी: जोधपुर) ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत अपने रिजल्ट और कट-ऑफ की जानकारी मांगी थी।
यहाँ पूरे मामले का विस्तृत विवरण दिया गया है ताकि आप इसे आसानी से समझ सकें:
1. अभ्यर्थी का चयन प्रक्रिया में प्रदर्शन और अंक -
अभ्यर्थी बंशीलाल (OBC वर्ग) ने इस परीक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन किया था। उन्होंने लिखित परीक्षा में 92.00 अंक प्राप्त किए, जो कि एक अच्छा स्कोर है। इस स्कोर के साथ ओबीसी पुरुष वर्ग में उनकी 18वीं रैंक रही।
2. चयन न होने का मुख्य कारण - बंशीलाल का चयन न होने के पीछे सिरोही जिले की हाई कट-ऑफ जिम्मेदार है। सिरोही जिले में ओबीसी पुरुष की अंतिम कट-ऑफ 93.00 रही। बंशीलाल के अंक 92.00 थे।
3. सामान्य वर्ग और अन्य श्रेणियों की तुलना - हैरानी की बात यह है कि बंशीलाल के अंक सामान्य वर्ग (General) की कट-ऑफ से बहुत ज्यादा थे, फिर भी उनका चयन नहीं हुआ। नीचे दी गई तालिका से मामला साफ हो जाएगा:
- सामान्य पुरुष कट-ऑफ: 81.00 (बंशीलाल के इससे 11 अंक ज्यादा थे)
- ईडब्ल्यूएस पुरुष कट-ऑफ: 77.00
- ओबीसी पुरुष कट-ऑफ: 93.00
भर्ती में कुल पद -
सिरोही जिले में पुलिस विभाग के कुल पद (constable) की बात करे तो कुल पद 58 थे, जिसमें
- सामान्य वर्ग (UR): कुल 25 (पुरुष - 13)
- ओबीसी (OBC): कुल 17 पद (पुरुष - 10)
- एससी (SC): कुल 05 पद
- एसटी (ST): कुल 04 पद
- ईडब्ल्यूएस (EWS): कुल 05 पद
- एमबीसी (MBC): कुल 02 पद
कुल 58 पद की भर्ती के लिए वर्ग वार पद उपरोक्त थे।
सामान्य वर्ग से ओबीसी के परिणाम ऊपर जाने के कारण -
सिरोही जिले में सामान्य वर्ग की तुलना में ओबीसी (OBC) की कट-ऑफ 12 अंक अधिक रहने का मुख्य तकनीकी कारण भर्ती नियमों का 'माइग्रेशन (Migration)' सिद्धांत है। आयु और छूट के नियम के आधार पर इसका विस्तृत विश्लेषण इस प्रकार से है।
- आयु और पात्रता छूट का प्रभाव - आरक्षित श्रेणी का ठप्पा (Tagging): भर्ती नियमों के अनुसार, यदि कोई ओबीसी अभ्यर्थी आवेदन करते समय आयु सीमा (Age relaxation), ऊंचाई, या सीने की माप जैसी किसी भी शारीरिक योग्यता में आरक्षित वर्ग की छूट का लाभ ले लेता है, तो वह 'आरक्षित अभ्यर्थी' की श्रेणी में ही सीमित हो जाता है।
- सामान्य वर्ग की सीट पर रोक: - छूट का लाभ लेने वाला अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में चाहे कितने भी अच्छे अंक प्राप्त कर ले, वह सामान्य वर्ग की कट-ऑफ को पार करने के बावजूद सामान्य श्रेणी की सीटों पर दावा नहीं कर सकता।
- प्रतिस्पर्धा का संकुचन: ऐसे सभी अभ्यर्थी जिन्होंने आयु में छूट ली है, वे केवल ओबीसी वर्ग के लिए आवंटित पदों के लिए ही आपस में मुकाबला करते हैं। जब उच्च अंक प्राप्त करने वाले बहुत से अभ्यर्थी इसी वर्ग में सिमट जाते हैं, तो मेरिट का ऊपर जाना स्वाभाविक है।
- मेरिट का ऊँचा जाना: राजस्थान जैसे प्रदेश में जब भर्ती पूरी पारदर्शी प्रक्रिया से होती है तो पूरा मुकाबला ओबीसी वर्ग के इर्द-गिर्द ही घूमता है। ऐसे में मेरिट तब ऊंची चली जाती है, जब पद संख्या कम हो और आयु छूट का ऑप्शन भी हो।
- सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा का अभाव - सामान्य वर्ग में भर्ती परीक्षाओं की प्रतियोगिता में कोई रुचि ही नहीं है, जिसके कारण ऐसे परिणाम आते हैं।
आयु छूट लेने के कारण अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में माइग्रेट नहीं हो पाया। इस तकनीकी नियम और ओबीसी वर्ग में उच्च प्रतिस्पर्धा के कारण, 92 अंक लाने के बावजूद बंशीलाल का चयन मात्र 1 अंक से रुक गया।
ओबीसी होने का क्या फायदा, अगर परिणाम ऐसे -
ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थी के दृष्टिकोण से, सिरोही जिले का यह परिणाम गहरी निराशा और 'फायदे' पर सवाल खड़ा करने वाला है। जब एक मेधावी छात्र 92 अंक (सामान्य कट-ऑफ 81 से कहीं अधिक) लाकर भी बाहर हो जाता है, तो इसके निहितार्थ कुछ इस प्रकार हैं:
चयन प्रक्रिया का कड़वा सच
चयन की अनिश्चितता: इस परिणाम से स्पष्ट है कि ओबीसी वर्ग में "आरक्षित" होने का अर्थ "सुरक्षित" होना बिल्कुल नहीं है। 92 अंक लाने और ओबीसी पुरुष वर्ग में 18वीं रैंक हासिल करने के बावजूद बंशीलाल का चयन नहीं होना यह साबित करता है कि यहाँ प्रतिस्पर्धा का स्तर सामान्य से कई गुना कठिन है।
राजस्व बनाम भविष्य: अभ्यर्थियों का तर्क है कि सरकार बड़ी संख्या में आवेदन आमंत्रित कर भारी राजस्व तो जुटाती है, लेकिन पदों का गणित (ओबीसी के लिए मात्र 17 पद) और तकनीकी नियम (आयु छूट के कारण माइग्रेशन पर रोक) मेधावी छात्रों के भविष्य को संकट में डाल देते हैं।
आरक्षण का विरोधाभास: यदि ओबीसी अभ्यर्थी आयु छूट लेता है, तो वह सामान्य श्रेणी की सीटों की दौड़ से बाहर हो जाता है। ऐसे में, वह आरक्षण जो लाभ के लिए था, वही 'सीमा' (Tagging) बन जाता है, जिससे मेरिट ऊंचाई पर पहुँच जाती है।
निष्कर्ष:
बंशीलाल का मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ओबीसी होना वास्तव में फायदेमंद है? जब सामान्य वर्ग में कम मेहनत (81 अंक) पर चयन संभव है, वहीं ओबीसी में कड़ी मेहनत (92 अंक) के बाद भी निराशा हाथ लगती है। वर्तमान व्यवस्था में, कम पदों और कड़े नियमों के बीच ओबीसी अभ्यर्थियों के लिए 'चयन संभव नहीं' जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है।
महत्वपूर्ण प्रश्न -
प्रश्न 1. क्या ओबीसी की मेरिट सामान्य वर्ग से अधिक हो सकती है?
उत्तर - जी हाँ, सिरोही पुलिस भर्ती इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है जहाँ सामान्य की कट-ऑफ 81.00 और ओबीसी की 93.00 रही। जब आरक्षित वर्ग में मेधावी छात्रों की संख्या अधिक हो और पद कम हों, तो तकनीकी नियमों (जैसे आयु छूट) के कारण आरक्षित वर्ग की मेरिट सामान्य से काफी ऊपर निकल जाती है।
प्रश्न 2. ओबीसी की कट-ऑफ सामान्य से ऊपर जाने के क्या कारण हैं?
उत्तर - इसका मुख्य कारण 'टैगिंग' और 'पदों की सीमित संख्या' है। यदि ओबीसी अभ्यर्थी आयु या अन्य छूट लेता है, तो वह सामान्य सीट पर नहीं जा सकता। जब बहुत से उच्च अंक वाले अभ्यर्थी अपनी ही श्रेणी के सीमित पदों (जैसे यहाँ 17 पद) के लिए लड़ते हैं, तो प्रतिस्पर्धा के कारण कट-ऑफ बढ़ जाती है।
प्रश्न 3. ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण फायदे की जगह नुकसान का कारण क्यों बन रहा है?
उत्तर - आरक्षण तब नुकसानदेह बन जाता है जब 'आयु छूट' जैसा लाभ अभ्यर्थी के लिए 'सीमा' बन जाए। छूट लेने के कारण बंशीलाल जैसा मेधावी छात्र, जिसके अंक सामान्य से 11 नंबर ज्यादा थे, सामान्य की 25 सीटों की दौड़ से बाहर हो गया और आरक्षण के दायरे में सिमट कर असफल रहा।
प्रश्न 4. भर्ती प्रक्रिया में 'Migration' के नियम से ओबीसी को नुकसान क्यों?
उत्तर - माइग्रेशन नियम के अनुसार केवल वही आरक्षित अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में जा सकता है जिसने कोई लाभ (छूट) न लिया हो। ओबीसी के अधिकांश मेधावी छात्र अक्सर आयु सीमा में छूट का लाभ लेते हैं, जिससे वे सामान्य वर्ग में माइग्रेट नहीं कर पाते और अपनी ही कैटेगरी की मेरिट को अत्यधिक बढ़ा देते हैं।
प्रश्न - 5. 'राजस्व बनाम भविष्य' - ओबीसी वर्ग की क्या शिकायत है?
उत्तर - अभ्यर्थियों का तर्क है कि सरकार विज्ञापनों और लाखों आवेदनों से भारी राजस्व जुटाती है, लेकिन पदों का असमान वितरण और जटिल तकनीकी नियम योग्य ओबीसी युवाओं के भविष्य को अधर में लटका देते हैं। 92 अंक लाने पर भी चयन न होना व्यवस्था की विफलता के रूप में देखा जाता है।
प्रश्न - 6. सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा का अभाव ओबीसी के लिए घातक क्यों?
उत्तर - लेख के अनुसार, सामान्य वर्ग में कम रुचि या कम प्रतिस्पर्धा के कारण वहां की कट-ऑफ काफी नीचे (81.00) रह जाती है। इसका खामियाजा ओबीसी के उन छात्रों को भुगतना पड़ता है जो बहुत मेहनत करके 92 अंक लाते हैं, लेकिन सामान्य सीटों पर दावा न कर पाने के कारण बाहर हो जाते हैं।
प्रश्न 7. ओबीसी आरक्षण चयन के लिए चुनौती क्यों?
उत्तर - वर्तमान दौर में ओबीसी होना 'चयन की गारंटी' नहीं बल्कि 'कड़ी परीक्षा' बन गया है। सीमित पदों पर भारी भीड़ और 'टैगिंग' जैसे नियमों ने ओबीसी वर्ग के लिए चयन को एक बड़ी चुनौती बना दिया है, जहाँ 90% से अधिक अंक लाने पर भी अभ्यर्थी खुद को असुरक्षित महसूस करता है।


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